DELHI ,23 JAN 2025/SANPADAN RAM PARKASH VATS
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (बीआईएसए) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय जलवायु-सहिष्णु कृषि नवाचार (एनआईसीआरए) की समीक्षा कार्यशाला तथा एटलस ऑफ क्लाइमेट अडैप्टेशन इन इंडियन एग्रीकल्चर (ACASA–India) के लॉन्च-कम-यूज़ केस कार्यशाला का उद्घाटन गुरुवार को नई दिल्ली में किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने किया।

इस कार्यशाला का उद्देश्य NICकार्यशाला का मुख्य उद्देश्य एनआईसीआरए के 15 वर्षों के अनुभवों का समेकन करना, जलवायु सहनशीलता के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों का मूल्यांकन करना तथा विज्ञान, नीति-संरेखण और लक्षित निवेश के माध्यम से जलवायु-सहिष्णु कृषि-खाद्य प्रणालियों को मजबूत करने के लिए एक डेटा-आधारित रोडमैप तैयार करना रहा।उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. एम. एल. जाट ने कहा कि बसंत पंचमी जैसे ज्ञान और नवचेतना के प्रतीक पर्व पर भारत की जलवायु सहनशीलता की यात्रा पर विचार करना और आकाशा एटलस व एनआईसीआरए पोर्टल जैसे राष्ट्रीय ज्ञान मंचों का शुभारंभ करना अत्यंत सार्थक है। उन्होंने कहा कि एनआईसीआरए 15 वर्षों की यात्रा के बाद एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां स्पष्ट रणनीतिक दिशा और दीर्घकालिक दृष्टि की आवश्यकता है। बार-बार आने वाली जलवायु चुनौतियों, विशेषकर वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में, भारतीय कृषि ने उल्लेखनीय सहनशीलता और उत्पादकता में वृद्धि दर्ज की है, जो जलवायु-सहिष्णु तकनीकों और सहायक नीतियों की सफलता को दर्शाता है।

डॉ. जाट ने यह भी रेखांकित किया कि भारत की जलवायु सहनशीलता एक एकीकृत तंत्र पर आधारित है, जिसमें वैज्ञानिक अनुसंधान, नीतिगत समर्थन, तकनीकी नवाचार, सामाजिक सुरक्षा, मानव संसाधन विकास और समन्वित कार्यान्वयन शामिल हैं। एनआईसीआरए, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, पशुधन एवं मत्स्य मिशन जैसी योजनाएं मिलकर किसानों की अनुकूलन क्षमता और आजीविका को सुदृढ़ कर रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि डेटा, अनुभवों और निवेशों को एक राष्ट्रीय जलवायु कार्य मंच में एकीकृत करने तथा ‘सम्पूर्ण सरकार’ और ‘सम्पूर्ण समाज’ दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।इस अवसर पर डॉ. जाट ने एटलस ऑफ क्लाइमेट अडैप्टेशन इन इंडियन एग्रीकल्चर (ACASA–India) का औपचारिक शुभारंभ भी किया। यह एक वेब-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसे आईसीएआर के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा प्रणाली (NARES) ने बीआईएसए-सीआईएमएमवाईटी के सहयोग से विकसित किया है। यह प्लेटफॉर्म स्थान-विशिष्ट और डेटा-आधारित अनुकूलन योजनाएं बनाने में सहायक होगा।

कार्यक्रम में आईसीएआर के उप महानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन) डॉ. ए. के. नायक, उप महानिदेशक (कृषि विस्तार) डॉ. राजबीर सिंह, एनआईसीआरए विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष डॉ. बी. वेंकटेश्वरलु, आईसीएआर-केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद के निदेशक डॉ. वी. के. सिंह तथा बीआईएसए-सीआईएमएमवाईटी के क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रमुख डॉ. पी. के. अग्रवाल सहित अनेक गणमान्य वैज्ञानिक और अधिकारी उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में डॉ. राजबीर सिंह ने कहा कि यह कार्यशाला जलवायु कार्रवाई के लिए विज्ञान को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच है। उन्होंने भविष्य की जलवायु रणनीतियों और निवेश के लिए मजबूत एवं विश्वसनीय कार्बन क्रेडिट पद्धतियों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया।डॉ. ए. के. नायक ने कहा कि यह कार्यशाला वैश्विक कृषि समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें विज्ञान, डेटा और व्यावहारिक अनुभवों को एक साथ लाकर कृषि-खाद्य प्रणालियों की जलवायु सहनशीलता को मजबूत करने पर चर्चा की जा रही है।
कार्यशाला में बताया गया कि एनआईसीआरए वर्तमान में देश के 151 अत्यधिक जलवायु-संवेदनशील जिलों में 200 से अधिक स्थानों पर क्रियान्वित किया जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा कि एनआईसीआरए को और सशक्त बनाना 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में भारत की यात्रा के लिए आवश्यक है।उद्घाटन सत्र में आईसीएआर के विभिन्न प्रभागों के उप महानिदेशक और वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।

