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फतेहपुर रणभूमि में सियासी संग्राम: विरासत, अंतर्कलह और नए चेहरों की जंग में उलझी भाजपा

RamParkash Vats
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Editorial viewpoint: Brainstorming and analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

​हिमाचल प्रदेश की राजनीति में कांगड़ा जिला हमेशा से सत्ता की चाबी रहा है, और इसमें भी फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र अपनी अनूठी राजनीतिक तासीर के लिए जाना जाता है। जैसे-जैसे चुनावों की आहट नजदीक आ रही है, फतेहपुर की वादियों में राजनीतिक गोटियां फिट करने का दौर शुरू हो चुका है। जहाँ एक ओर कांग्रेस अपने ‘एकमात्र दुर्ग’ को बचाने की जुगत में है, वहीं भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बाहरी दुश्मनों से ज्यादा ‘अपनों की अंतरकलह’ बनती दिख रही है।भाजपा: ‘अपनों’ की भीड़ में खोता नेतृत्व? ​फतेहपुर भाजपा के लिए पिछले 15 साल एक कड़वे अनुभव की तरह रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पार्टी यहाँ कांग्रेस से कम और अंतर्कलह से ज्यादा हारी है। वर्तमान परिदृश्य में टिकट के चाहवानों की लंबी फेहरिस्त ने हाईकमान की धड़कनें बढ़ा दी हैं: ​राकेश पठानिया: नूरपुर से फतेहपुर का रुख करने वाले पूर्व मंत्री अपनी जमीन तलाश रहे हैं।बलदेव ठाकुर, मदन राणा और ओम प्रकाश: ये वे चेहरे हैं जो लंबे समय से धरातल पर पसीना बहा रहे हैं। ​नया ट्विस्ट: सूत्रों की मानें तो दो और प्रबल दावेदार गुप्त रूप से अपनी फील्डिंग सजा रहे हैं, जिससे भाजपा का ‘चक्रव्यूह’ और जटिल हो गया है।देहरी से सुशांत का ‘शंखनाद’: विरासत का नया वारिस ​हाल ही में देहरी में आयोजित जनमिलन कार्यक्रम ने फतेहपुर की सियासत में नया उबाल ला दिया है। पूर्व मंत्री और कद्दावर नेता राजन सुशांत ने अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज में न केवल कांग्रेस को घेरा, बल्कि भाजपा के भीतर भी एक नई लकीर खींच दी है। ​“धैर्य सुशांत ही फतेहपुर से भाजपा का चेहरा होंगे” — राजन सुशांत का यह ऐलान उन विरोधियों के लिए सीधा संदेश है जो उन्हें हाशिए पर मान रहे थे। ​सुशांत का भावनात्मक कार्ड (बीमारी से रिकवरी) और ‘भारत का वर्तमान मोदी, भविष्य योगी’ वाला नारा सीधे तौर पर कट्टर हिंदूवादी वोट बैंक और युवाओं को साधने की कोशिश है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने बेटे धैर्य सुशांत की राजनीतिक लॉन्चिंग के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। ​कांग्रेस: भवानी के कंधों पर विरासत का भार ​दूसरी ओर, कांग्रेस की स्थिति फिलहाल ‘शांत’ दिख रही है, लेकिन यह शांति कितनी गहरी है, यह वक्त बताएगा। भवानी सिंह पठानिया अपने पिता सुजान सिंह पठानिया की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके पास ‘एकमात्र चेहरा’ होने का लाभ तो है, लेकिन सुशांत द्वारा बेरोजगारी, कर्ज और कानून-व्यवस्था पर किए गए तीखे हमले उनके लिए चुनावी राह को पथरीला बना सकते हैं​राजनीतिक बिसात के मुख्य बिंदु: ​होम टू होम संपर्क: दावेदारों ने अब ड्राइंग रूम की राजनीति छोड़ ‘धरातल’ पर दस्तक देना शुरू कर दिया है। ​नशा और कानून व्यवस्था: राजन सुशांत ने पुलिस और सरकार के गठजोड़ पर हमला बोलकर इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है। ​टिकट का गणित: भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह पांच-छह गुटों में बंटी पार्टी को एक झंडे के नीचे कैसे लाए। फतेहपुर में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। एक तरफ भवानी पठानिया का ‘धैर्य’ है, तो दूसरी तरफ सुशांत का ‘शंखनाद’ और भाजपा के दिग्गजों की आपसी ‘होड़’। फतेहपुर की जनता इस बार ‘अनुभव’ को चुनती है या ‘विरासत के नए चेहरे’ को, यह तो वक्त की गर्त में है, लेकिन इतना तय है कि इस बार का राजनीतिक चक्रव्यूह भेदना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा।

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