शिमला /08/01/2026/ सूत्र
हिमाचल प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की दिशा में सरकार ने एक ऐतिहासिक और सख़्त फ़ैसला लिया है। प्रदेश भर में विभागों और कार्यालयों द्वारा संचालित 50,000 से अधिक सरकारी बैंक खातों को समेकित कर अब प्रत्येक कार्यालय के लिए केवल एक समग्र बैंक खाता रखने का निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में सामने आया कि बिखरे हुए खातों ने न केवल निगरानी को कमजोर किया, बल्कि जवाबदेही को भी धुंधला कर दिया था। अब यह व्यवस्था वित्तीय अनुशासन की नई इबारत लिखने जा रही है।
इस कार्रवाई की शुरुआत शिक्षा विभाग से की गई है, जहां कई चालू खातों को बंद कर एक ही डी.डी.ओ. खाते में समाहित करने के निर्देश जारी हुए हैं। सबसे अहम बदलाव यह है कि खातों पर मिलने वाला ब्याज, जो अब तक स्थानीय कार्यालयों तक सीमित रहता था, अब सीधे सरकारी खजाने में जमा होगा। जिन खातों ने पहले ब्याज जमा नहीं कराया, उन्हें तत्काल राशि जमा करने के आदेश दिए गए हैं। साथ ही वर्षों से निष्क्रिय पड़े खातों को पुनः सक्रिय कर उनमें फंसी सार्वजनिक धनराशि को राज्य कोष में लाने की प्रक्रिया तेज़ कर दी गई है।
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से यह कदम पारदर्शिता की ओर मज़बूत क़दम माना जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि इससे वित्तीय गड़बड़ियों की गुंजाइश कम होगी और सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा। वहीं विपक्ष इसे अत्यधिक केंद्रीकरण बताकर स्थानीय कार्यालयों की वित्तीय स्वतंत्रता पर चोट करार दे सकता है। व्यवहारिक चुनौती भी कम नहीं है—हज़ारों खातों का समेकन, बैंकों से समन्वय और समयबद्ध क्रियान्वयन प्रशासन की परीक्षा लेगा। फिर भी सरकार का तर्क है कि कठोर फ़ैसलों के बिना सुधार संभव नहीं।
कुल मिलाकर, हिमाचल सरकार का यह निर्णय केवल खातों के बंद होने या खुलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक धन के प्रति जवाबदेही और विश्वास की पुनर्स्थापना का प्रयास है। निष्क्रिय खातों से धन निकालकर उसे जनकल्याण के कामों में लगाने की यह पहल राज्य की वित्तीय सेहत को मज़बूती दे सकती है। यदि यह व्यवस्था ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से लागू होती है, तो यह निर्णय हिमाचल में सुशासन और वित्तीय अनुशासन का एक स्थायी उदाहरण बन सकता है।

