
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 13 वर्ष केवल सत्ता की अवधि नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और परिभाषा बदलने वाला कालखंड हैं। यह शासनकाल विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और राजनीतिक नैरेटिव—चारों स्तरों पर गहरी छाप छोड़ता है। समर्थकों के लिए यह “निर्णायक नेतृत्व” का युग है, तो आलोचकों के लिए “केंद्रीकृत सत्ता” का। किंतु संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह दौर उपलब्धियों और सवालों—दोनों का संतुलित आकलन मांगता है।
विकास की राजनीति : आंकड़ों से आगे नैरेटिव तक
पिछले 13 वर्षों में बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार देखने को मिला। एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, वंदे भारत ट्रेनें, हवाई अड्डों का नेटवर्क और डिजिटल इंडिया ने शासन की प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। यूपीआई और डीबीटी ने कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ाई और सरकारी तंत्र में तकनीक की भूमिका निर्णायक हुई। विकास अब केवल नीति नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान बन गया—जिसे सरकार ने कुशल संचार के जरिए जनमानस तक पहुंचाया।
रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा : सख्ती का संदेश
मोदी शासनकाल में रक्षा क्षेत्र को नई गति मिली। स्वदेशीकरण पर जोर, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा उत्पादन, ब्रह्मोस, तेजस और रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी—ये सभी राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक और रणनीतिक प्राथमिकता बनाने का संकेत हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट कार्रवाई ने सरकार की “सख्त” छवि को मजबूत किया। इससे राजनीति में यह संदेश गया कि सुरक्षा अब समझौते का विषय नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श का केंद्र है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत : आत्मविश्वास की कूटनीति
विदेश नीति में भारत की सक्रियता इस दौर की बड़ी उपलब्धि रही। जी-20 की अध्यक्षता, क्वाड, इंडो-पैसिफिक रणनीति और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनने का दावा—इन सबने भारत को एक आत्मविश्वासी शक्ति के रूप में स्थापित किया। प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत कूटनीति ने भारत की वैश्विक छवि को मजबूत किया और घरेलू राजनीति में नेतृत्व की स्वीकार्यता को और गहराया।
राजनीति को नई दिशा : मुद्दों से विमर्श तक नियंत्रण
इन उपलब्धियों के समानांतर, मोदी सरकार ने भारतीय राजनीति की शैली बदल दी। विकास, राष्ट्रवाद और सुरक्षा को एक साझा नैरेटिव में पिरोकर सत्ता ने विमर्श की दिशा स्वयं तय की। उपलब्धियों का श्रेय केंद्र को, और विफलताओं का कारण पिछली सरकारें या वैश्विक परिस्थितियां—यह संतुलन सत्ता को राजनीतिक बढ़त देता रहा। यहीं से “चित भी मेरी, पट भी मेरी” की धारणा जन्म लेती है।
सारगर्भित है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 13 वर्ष का शासनकाल उपलब्धियों की अनदेखी नहीं करता—विकास, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय पहचान में भारत ने ठोस कदम बढ़ाए हैं। लेकिन लोकतंत्र का मापदंड केवल उपलब्धियां नहीं, बल्कि सवालों के लिए खुला स्थान भी है। इस दौर ने देश को एक नई राजनीतिक दिशा दी—तेज, निर्णायक और नैरेटिव-प्रधान। चुनौती अब यह है कि यह दिशा विकास और सुरक्षा के साथ-साथ लोकतांत्रिक संतुलन और जवाबदेही को भी उतनी ही मजबूती से साध पाए।

