पौंग झील किनारे मृत मिल रहे प्रवासी परिंदे, लोगों में वर्ड फ्लू की दशहत
JAWALI(kANGRA)/ 29/12/2025 ब्यूरो चीफ विजय समयाल
पौंग बांध क्षेत्र में हाल के दिनों में घटित घटनाएं न केवल चौंकाने वाली हैं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं। अभी विस्फोटक गोलों से गायों के जबड़े उड़ने और उनकी मौत का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि अब पौंग झील में विदेशी (प्रवासी) परिंदों के मृत मिलने की खबरों ने क्षेत्र में नया तूफान खड़ा कर दिया है। स्त्रोतों के अनुसार यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि बीते करीब 45 वर्षों से यह सिलसिला अविरल रूप से चलता आ रहा है।

45 वर्षों में कितनी मौतें? स्पष्ट आंकड़ों का अभाव
वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों के अनुसार पौंग बांध में वर्ष 1974 में झील के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक सैंकड़ों प्रवासी पक्षियों की असमय मौत हो चुकी है। हालांकि वन्य प्राणी विभाग के पास इसका कोई समेकित और सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। स्त्रोत बताते हैं कि कभी जहरीली कृषि दवाइयों, कभी प्रतिकूल जलवायु, तो कभी बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों के नाम पर इन मौतों को अलग-अलग कारणों से जोड़कर मामला दबा दिया जाता रहा है।
झील किनारे विभागीय भूमि पर मौतें
ताजा मामले में पौंग झील किनारे वन्य प्राणी विभाग की भूमि पर कई स्थानों पर प्रवासी परिंदे मृत पाए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो-तीन वर्ष पहले भी बर्ड फ्लू के चलते बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों की जान गई थी। बावजूद इसके, सुरक्षा और निगरानी के दावे करने वाला वन्य प्राणी विभाग इस बार भी कथित तौर पर कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ नजर आ रहा है।
खेती, ज़हर और शिकार—मौत का त्रिकोण
पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय स्त्रोतों का आरोप है कि विभागीय प्रतिबंधों के बावजूद झील किनारे अवैध खेती धड़ल्ले से की जा रही है। इसी खेती की आड़ में फसलों को कीटों से बचाने के लिए खेतों में जहरीली दवाइयों का प्रयोग किया जाता है, जिससे दाना चुगने वाले प्रवासी परिंदे मौत के घाट उतर रहे हैं। इतना ही नहीं, जंदरियां लगाकर पक्षियों का शिकार किए जाने की भी शिकायतें सामने आई हैं।
मिलीभगत के आरोप और बढ़ता आक्रोश
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यह खेती विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से हो रही है। उनका दावा है कि इस समय पौंग झील क्षेत्र में करीब 60 हजार प्रवासी परिंदे पहुंच चुके हैं, जो साइबेरिया और अन्य देशों से लंबी दूरी तय कर यहां आते हैं। ऐसे में यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि अपनी पहचान खो सकती है।
कोर्ट जाने की चेतावनी
पर्यावरण प्रेमियों ने वन्य प्राणी विभाग को चेताया है कि यदि झील किनारे हो रही अवैध खेती और प्रवासी परिंदों का शिकार तुरंत बंद नहीं हुआ, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पीछे नहीं हटेंगे। उनका कहना है कि मौतों के पीछे असली कारण—चाहे वह प्रतिकूल वातावरण हो, जहरीली दवाइयां हों, बर्ड फ्लू हो या कोई और साजिश—उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि यह सिलसिला हमेशा के लिए टूट सके।
विश्लेषणतः पौंग बांध में बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं केवल वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का भी आईना हैं। सवाल यह है कि क्या इस बार जिम्मेदार महकमे जागेंगे, या फिर प्रवासी परिंदों की मौतें भी फाइलों में दफन होकर रह जाएंगी।

