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जनसंख्या संक्रमण के दौर में भारत: घटती जन्म-मृत्यु दर के बीच कुपोषण से जूझता बचपन, स्वास्थ्य प्रगति की चमक और सामाजिक असमानता की गहरी चुनौती

RamParkash Vats
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Editorial Viewpoint: Brainstorming and Analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

जन्म दर और मृत्यु दर में दशकीय परिवर्तन, आकड़ों की तुलना और सामाजिक अर्थ:पिछले एक दशक में भारत की जनसांख्यिकीय संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जो न केवल सांख्यिकीय आंकड़ों में परिलक्षित होते हैं बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य पर भी गहरे प्रभाव छोड़ते हैं। 2015 के दशक की शुरुआत में भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) अपेक्षाकृत उच्च थी, परन्तु 2025 तक यह घटकर लगभग 1.9 बच्चों प्रति महिला हो गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से भी नीचे है और यह दर्शाता है कि युवा आबादी के बीच बच्चों के जन्म लेने की प्रवृत्ति बदल रही है। राष्ट्रीय स्तर पर जन्म दर भी घटकर लगभग 18.4 प्रति 1,000 जनसंख्या तक आ चुकी है, जो पूर्व की तुलनात्मक दरों से स्पष्ट गिरावट दर्शाती है। इसी अवधि में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (Under-5 Mortality Rate) में भी उल्लेखनीय कमी आई है: 2015 से 2023 तक यह लगभग 48 से घटकर 28 प्रति 1,000 जीवित जन्मों के स्तर पर आ गई है। यह प्रगति ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, यह दिखाती है कि स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण कवरेज, तथा बाल एवं मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों की पहुंच में सुधार हुआ है। हालांकि राष्ट्रीय औसत में गिरावट स्पष्ट है, पर विभिन्न राज्यों में असमानता स्पष्ट बनी हुई है — कुछ राज्यों ने उल्लेखनीय रूप से नीचे मातृ और शिशु मृत्यु दर हासिल की है जबकि अन्य पिछड़े क्षेत्रों में अभी भी जोखिम उच्च बना हुआ है।

लेकिन इन सकारात्मक रुझानों के बीच आलोचनात्मक सवाल यह उठता है कि क्या मात्र दरों में गिरावट यह संकेत देती है कि मूलभूत सामाजिक चुनौतियाँ समाप्त हो गई हैं? निःसंदेह, कुल जन्म दर में गिरावट का एक कारण सुधरी शिक्षा, परिवार नियोजन, और जागरूकता है, लेकिन यह भी संकेत है कि सामाजिक आशंकाएँ, आर्थिक दबाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएँ परिवारों के निर्णयों को प्रभावित कर रही हैं, जिसमें बच्चे पैदा करने की इच्छा भी शामिल है। इनमें से कुछ पहलू सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का परिणाम हैं — जैसे युवाओं में करियर प्राथमिकीकरण, शहरीकरण और जीवन की लागत में वृद्धि। दूसरी ओर, मृत्यु दर के गिरने के कारण तकनीकी सुधार और स्वास्थ्य प्रणालियों की बुनियादी मजबूती हैं; पर यह भी सच है कि वे जितने “औसत” आंकड़े दिखाते हैं, वे उतनी ही कच्ची वास्तविकता को छुपाते हैं — हर मृत बच्चे के पीछे एक परिवार, एक संभावित जीवन की आकांक्षा और सामाजिक असमानता की कहानी होती है।

कुपोषण की वास्तविक स्थिति और बाल मृत्यु में योगदान:जहाँ एक ओर जन्म-मृत्यु दर में गिरावट को विकास का संकेत माना जा रहा है, वहीं कुपोषण जैसे अघातक सामाजिक समस्या ने बाल स्वास्थ्य के परिदृश्य को तह तक प्रभावित किया है। भारत में आज भी निम्न वजन वाले (Low birth weight) बच्चों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है, और अनुमान है कि भारत में लगभग 43 प्रतिशत नवजात शिशु कम वजन के साथ जन्म लेते हैं, जो उनके जीवन की पहली समस्याओं को जन्म देता है। इसी कुपोषण की वजह से 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों का लगभग आधा हिस्सा सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पोषण की कमी से जुड़ा हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें बताती हैं कि विशेष रूप से कमजोर पोषण और दुर्व्यवहार के कारण “स्टंटिंग” यानी बच्चों की कद-काठी के विकास में रुकावट जैसी समस्याएँ अधिक प्रचलित हैं, जिससे बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है और वे सामान्य संक्रमणों के प्रति भी असहाय हो जाते हैं।

कुपोषण के पीछे केवल भोजन की कमी नहीं है, बल्कि पोषण की गुणवत्ता, हेल्थकेयर तक असमान पहुंच, शिक्षा की कमी और गरीबी की परंपरागत चुनौतियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उदाहरण के तौर पर कई ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में माँओं को गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त पोषण, स्वास्थ्य शिक्षा, और प्रसव पूर्व सेवाएँ प्रदान नहीं हो पाती, जिससे जन्म के समय बच्चों का स्वास्थ्य पहले से ही कमजोर स्थिति में होता है। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में “संभव” जैसे अभियान कुपोषण से ग्रस्त बच्चों की हालत में सुधार दिखा रहे हैं — जैसे उत्तर प्रदेश में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों में 40% से अधिक सुधार दर्ज हुआ है।लेकिन यह सफलता व्यापक आर्थिक और सामाजिक योजनाओं के बिना सतत नहीं रह सकती। हमें यह भी समझना होगा कि कुपोषण केवल सांख्यिकीय समस्या नहीं, बल्कि समाज की कमजोर सुरक्षा जाल, शिक्षा विभाजन और लिंग-आधारित प्राथमिकताओं का दुष्चक्र बन चुका है।

कुपोषण और बाल मृत्यु के बीच सम्बंध अत्यंत गहरा है: पोषण की कमी बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को ढहाती है, जिससे मामूली संक्रमण भी जानलेवा बन सकता है। जहां स्वास्थ्य प्रणालियाँ कमजोर हैं, वहाँ ऐसे बच्चों को उचित इलाज भी नहीं मिलता, जो जन्म के कुछ ही महीनों में उनकी मौत का कारण बन जाता है। यह समस्या न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र तक सीमित है, बल्कि शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, और सामाजिक सुरक्षा जैसे व्यापक विकास एजेंडा को चुनौती देती है।

चिंतन, सामाजिक नीति और भविष्य की दिशा:दशक भर की प्रगति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जिस गति से भारत ने जन्म और बाल मृत्यु दर में कमी हासिल की है, वह सराहनीय है — परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि समस्या समाप्त हो गई है। सामाजिक संरचना में गहरे बदलाव की आवश्यकता है जिससे हर बच्चा सिर्फ जिए नहीं बल्कि स्वस्थ, पोषित और सशक्त जीवन जी सके। यह तभी संभव है जब नीतिगत स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, उत्कृष्ट पोषण कार्यक्रम, और विशेषकर माताओं एवं गर्भवती महिलाओं को सुदृढ़ स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की जाए। नीति-निर्माताओं को यह ध्यान रखना होगा कि स्थिर और दीर्घकालिक स्वास्थ्य कार्यक्रम न केवल औपचारिक सुविधाओं तक पहुंच बढ़ाएँ, बल्कि समुदाय-आधारित पोषण शिक्षा, स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे, और गरीबी उन्मूलन योजनाओं के साथ एकीकृत हों।

साथ ही यह भी आवश्यक है कि कुपोषण के सामाजिक कारणों, जैसे लैंगिक असमानता, घरेलू निर्णय-प्रक्रियाओं में महिलाओं की सहभागिता, और ग्रामीण-शहरी विभाजन पर गंभीर ध्यान दिया जाए। आज की युवा पीढ़ी की सोच बदल रही है — पारंपरिक परिवार आकारों में परिवर्तन, शिक्षा में वृद्धि, और वैश्विक आर्थिक दबाव बच्चों के जन्म लेने की आकांक्षा को प्रभावित कर रहे हैं — यह न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक और मानवीय प्रश्न भी खड़े करता है। इस परिवर्तनशील परिदृश्य में नीति-निर्माता, समाज और नागरिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे देश की अगली पीढ़ी सिर्फ़ संख्या मात्र न बढ़ाये बल्कि स्वस्थ, सुरक्षित और सक्षम बनकर उभरे, जिससे देश का सामाजिक और आर्थिक विकास भी दिग्गज पथ पर अग्रसर हो सके।

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