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हिमाचल प्रदेश में भूजल संकट: गिरता जलस्तर—मानवता के लिए चेतावनी

RamParkash Vats
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Editorial Viewpoint: Brainstorming and Analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats


इस संकट के वैज्ञानिक कारण प्रकृति और मानव के रिश्ते में आए असंतुलन की ओर इशारा करते हैं। जलवायु परिवर्तन ने हिमाचल की पारंपरिक वर्षा और हिमपात प्रणाली को प्रभावित किया है। अनियमित मानसून, घटती बर्फबारी और बार-बार सूखे जैसी स्थितियों ने नदियों, झरनों और धाराओं की जीवनधारा को कमजोर किया है, जो कभी भूजल रिचार्ज की रीढ़ हुआ करती थीं। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि हिमालयी क्षेत्र के लगभग आधे झरने या तो सूख चुके हैं या उनका प्रवाह बेहद कम हो गया है—और इसका सीधा असर मैदानी जिलों में भूजल पुनर्भरण पर पड़ा है। भौगोलिक दृष्टि से हिमाचल की कई घाटियाँ अलोवियल मिट्टी पर स्थित हैं, जो सामान्यतः जलसंग्रह के लिए अनुकूल मानी जाती हैं, पर जब वर्षा ही कम हो और प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो जाए, तो यह क्षमता भी निष्क्रिय हो जाती है। प्रकृति मानो कह रही है—यदि संतुलन बिगड़ा, तो संसाधन भी साथ छोड़ देंगे।


वैज्ञानिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक और मानवीय हस्तक्षेपों ने इस संकट को और गहरा किया है। कृषि, उद्योग और बढ़ती आबादी की प्यास ने भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन किया। ऊना घाटी में 2011 के आँकड़े बताते हैं कि भूजल विकास का स्तर 108 प्रतिशत तक पहुँच चुका था—अर्थात जितना पानी धरती भर सकती थी, उससे कहीं अधिक निकाल लिया गया। औद्योगिक इकाइयों और सिंचाई परियोजनाओं ने ट्यूबवेलों की संख्या बढ़ाई, पर रिचार्ज की चिंता पीछे छूटती चली गई। शहरीकरण और कंक्रीटीकरण ने रही-सही कसर पूरी कर दी। बद्दी, नालागढ़, बरोटीवाला और कालाअंब जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में नालों और जल-निकासी मार्गों पर कंक्रीट की परत चढ़ गई, जिससे वर्षाजल धरती की कोख तक पहुँच ही नहीं पाता। परिणाम यह कि इन क्षेत्रों में जलस्तर 50 से 70 मीटर तक नीचे चला गया—और यह गिरावट केवल धरती में नहीं, हमारी विकास-दृष्टि में भी दिखाई देती है।


नीतिगत स्तर पर प्रयास हुए हैं, पर वे अभी पर्याप्त सिद्ध नहीं हो पाए। वर्षाजल संचयन के लिए 956 स्थलों पर संरचनाएँ बनाने की 139 करोड़ रुपये की परियोजना, और 2005 का हिमाचल प्रदेश भूजल विनियमन अधिनियम—ये कदम स्वागतयोग्य हैं। अब तक 562 संरचनाओं का निर्माण भी हो चुका है, पर सवाल यह है कि क्या ये प्रयास ज़मीन पर उतने प्रभावी हैं, जितने काग़ज़ों पर दिखते हैं? कई योजनाएँ स्थानीय भू-वैज्ञानिक परिस्थितियों की बजाय जनाकांक्षाओं के आधार पर बनीं, जिससे उनका लाभ सीमित रह गया। भूजल निगरानी नेटवर्क अधूरा रहा और समुदाय की भागीदारी औपचारिकता तक सिमट गई। विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि जब तक स्थानीय डेटा, पारंपरिक ज्ञान और जन-सहभागिता को नीति के केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक कोई भी योजना स्थायी समाधान नहीं बन सकती। जल संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन की माँग करता है।


निष्कर्ष स्पष्ट है हिमाचल के मैदानी क्षेत्रों में गिरता भूजल स्तर मानवता के लिए चेतावनी है, और इसे प्रकृति की अंतिम पुकार समझना होगा। केंद्रीय भूजल बोर्ड के वैज्ञानिकों का कहना है कि सतही कंक्रीटीकरण और अव्यवस्थित विकास ही इस गिरावट के मूल कारण हैं। अब समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करें—जहाँ सड़कें और इमारतें हों, पर जल के रास्ते बंद न हों; जहाँ उद्योग हों, पर धरती की कोख खाली न हो। अधिक से अधिक वर्षाजल संचयन, पारंपरिक जलस्रोतों का पुनर्जीवन, और भूजल दोहन का सख्त व पारदर्शी विनियमन—यही आगे का मार्ग है। जल संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व की शर्त है। यदि आज हमने सामूहिक जनहित में जल को नहीं बचाया, तो कल इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद करेगा, जिसने पानी होते हुए भी भविष्य को सूखा छोड़ दिया।

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