संपादकीय चिंतन, मंथन, विश्लेषण और समाधान: राम प्रकाश वत्स
बदलती जीवनशैली और रसायनों की मार: हिमाचल के स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा:-हिमाचल जैसी शांत, स्वच्छ और प्राकृतिक सुंदरता से भरी पहाड़ी भूमि में कैंसर जैसे रोगों का तेजी से फैलना सचमुच पूरे समाज को हिला देने वाली चेतावनी है। पर्वतीय प्रदेश, जहां कभी स्वच्छ जलवायु और जैविक खानपान को स्वास्थ्य का आधार माना जाता था, आज आधुनिक जीवनशैली और रसायनिक प्रदूषण के बोझ तले कराह रहा है। कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग, खाद्य पदार्थों में मिलावट, प्लास्टिक और रासायनिक पैकेजिंग का बढ़ता चलन और बदलते भोजन–आदतों ने पहाड़ के गाँवों तक बीमारी का घेरा फैला दिया है।कैंसर रजिस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि हिमाचल के कांगड़ा, मंडी, हमीरपुर और सोलन जिलों में मामलों में चिंताजनक वृद्धि दर्ज हो रही है। बदलते खानपान, बढ़ते तनाव, जैविक खेती की घटती हिस्सेदारी और बाजार-केंद्रित कृषि मॉडल ने ग्रामीण परिवारों को भी अस्वस्थ जीवनशैली की ओर धकेल दिया है। यह केवल स्वास्थ्य संकट नहीं—यह हमारे सामाजिक–आर्थिक मॉडल की विफलताओं का दर्पण भी है।
जब चेतावनी सायरन बजने लगा: पहाड़ में कैंसर क्यों बढ़ रहा है? – एक गहन विश्लेषण:-कैंसर मामलों की रफ्तार का विश्लेषण यह दर्शाता है कि समस्या किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई परतों में फैली है। सबसे पहले, कृषि में रसायनों का उपयोग हिमाचल में पिछले दो दशकों में कई गुना बढ़ा है। खेतों में लगे रासायनिक स्प्रे की धुंध अब गांव की हवा में घुलने लगी है। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है आधुनिक प्रसंस्कृत खाद्य—चिप्स, पैकेट स्नैक्स, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स और प्रिज़र्वेटिवयुक्त उत्पादों का अत्यधिक सेवन। तीसरा कारक है जीवनशैली—कम शारीरिक श्रम, मोबाइल–केंद्रित दिनचर्या और देर रात तक जागना।स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर अब केवल एक स्वास्थ्य मुद्दा नहीं, बल्कि यह समाज की सामूहिक जीवनशैली में आया असंतुलन है। पहाड़ की सादगी और संतुलित जीवन अब शहरीकरण की आंधी में बहता जा रहा है। यह समय है जब हमें स्मरण करना चाहिए कि विकास का अर्थ केवल सड़कें, इमारतें और प्रोजेक्ट नहीं—बल्कि संतुलित और स्वस्थ समाज भी है।
दूसरी तरफ का तूफान: चिट्टा और नशे का फैलता जाल:-कैंसर के साथ ही हिमाचल एक और गंभीर सामाजिक तूफान का सामना कर रहा है—चिट्टा, हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स का प्रसार। यह केवल पुलिस–प्रशासन की चुनौती नहीं, बल्कि यह परिवार, समाज, आर्थिक संरचना और युवाओं के भविष्य पर सीधा हमला है।नशे का यह व्यापार सीमाई राज्यों से हिमाचल की सड़कों के माध्यम से फैल रहा है, लेकिन इसकी जड़ें अब गाँवों, कस्बों और स्कूल–कॉलेजों तक पहुँच चुकी हैं। जितने केस पकड़े जा रहे हैं, उससे कई गुना बड़ा नेटवर्क समाज की छाया में सक्रिय है। यह आँकड़े नहीं—पूरे युवा वर्ग की आशाओं पर लटका एक भयावह साया है। माता–पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर सशंकित हैं, और समाज हर रोज एक नई खबर के साथ और अधिक बेचैन हो रहा है।पिछले महीनों में सरकार और पुलिस की साझा मोर्चेबंदी, पंचायत स्तर तक जागरूकता अभियान और अदालतों की सख्त टिप्पणियों ने उम्मीद जरूर जगाई है, परंतु यह लड़ाई लंबी है। चिट्टा केवल एक पदार्थ नहीं—यह युवाओं का समय, स्वास्थ्य, बुद्धि और भविष्य चुरा लेने वाला सामाजिक दानव बन चुका है।
समाधान की दिशा: जागरूकता से लेकर नीति सुधार तक – एक समग्र रास्ता:-हिमाचल के इन दोनों बड़े संकटों—कैंसर और नशाखोरी—का समाधान किसी एक विभाग, एक योजना या एक अभियान से संभव नहीं। इसके लिए सामाजिक, प्रशासनिक, राजनीतिक और पारिवारिक सभी स्तरों पर एक संयुक्त और सतत प्रयास आवश्यक है।कैंसर के मोर्चे पर पहला कदम होगा—रसायनों की निर्भरता कम करना और जैविक खेती को नीति स्तर पर संरक्षित बढ़ावा देना। इसके साथ नियमित कैंसर स्क्रीनिंग, जिला अस्पतालों में उपचार सुविधाएँ बढ़ाना और खाद्य–सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना अनिवार्य है।नशे के खिलाफ समाधान केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं होना चाहिए। स्कूल–कॉलेजों में नशा विरोधी पाठ्यक्रम, युवाओं के लिए खेल और रोजगार के अवसर, परिवारों में संवाद, पुनर्वास केंद्रों की संख्या बढ़ाना और ड्रग रैकेट के मूल स्रोतों पर कार्रवाई ही स्थायी समाधान हैं।समाज तभी सुरक्षित होगा, जब हम “लक्षण” नहीं, बल्कि “कारण” को पहचान कर उपचार करेंगे। हिमाचल के लिए यह समय है मंथन, चिंतन और ठोस निर्णय लेने का—क्योंकि यह केवल आज की चुनौती नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और संस्कारों का प्रश्न है।

