संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश की सरकारें वर्षों से नशों के खिलाफ योजनाएँ बनाती रही हैं, घोषणाएँ होती रही हैं, अभियान शुरू होते रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ज़मीन पर पहुँचते-पहुँचते हर योजना दम तोड़ देती है। सवाल यह नहीं कि सरकार प्रयास नहीं करती—सवाल यह है कि क्या ये प्रयास समस्या की जड़ तक पहुँच पाते हैं? दुर्भाग्य से जवाब ‘नहीं’ है।

नशों का सबसे बड़ा संकट यह है कि हम नशे के सौदागरों का मजबूत जाल तोड़ नहीं पाते, लेकिन चलती फिरती दुकान चलाने वाला छोटा दुकानदार या कोई स्थानीय युवक आसानी से पुलिस का शिकार बन जाता है। असल गुनहगार छूट जाते हैं, और चक्रव्यूह रचने वाले मास्टरमाइंड तक पहुँचने की न तो पर्याप्त नीति है और न ही सख्त इच्छाशक्ति। ऐसे में किसी भी अभियान की सफलता सीमित ही रहेगी।फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की पहल—चिट्टा-मुक्त हिमाचल अभियान—आशाजनक जरूर है। धर्मशाला में आयोजित विशाल रैली ने यह संदेश दिया कि जनता जाग रही है और सरकार इस बार कुछ ठोस करने के लिए प्रतिबद्ध दिखती है। लेकिन प्रचार, जागरूकता और वॉकाथॉन केवल शुरुआत हैं; समाधान तब ही संभव है जब नशे के मुख्य स्त्रोतों, सीमा पार और अंतरराज्यीय नेटवर्क पर निर्णायक प्रहार हो।
जन-जागरूकता जरूरी, लेकिन जड़ पकड़ना अनिवार्य:-मुख्यमंत्री ने यह स्वीकार कर एक महत्वपूर्ण बात कही कि युवा स्वयं नशे की ओर नहीं बढ़ते, बल्कि तस्कर उन्हें फँसाते हैं। यह सोच सही दिशा में पहला कदम है। पंचायतों का रेड–येलो–ग्रीन वर्गीकरण, पुनर्वास केंद्रों की पहल, और माता-पिता को बिना डर अपनी बात रखने का भरोसा—ये सभी कदम सराहनीय हैं। लेकिन यह तभी सार्थक होंगे जब “रेड ज़ोन” की जड़ें काटने के लिए ठोस पुलिसिंग और इंटरस्टेट कोऑर्डिनेशन हो।
सूचना देने वालों को इनाम : सही दिशा पर सवाल भी :-चिट्टा सूचना योजना में 2 ग्राम से लेकर एक किलो तक की सूचना पर दस हजार से दस लाख रुपए तक का इनाम देने की घोषणा निश्चित रूप से नशा-विरोधी नेटवर्क को मजबूत कर सकती है। इससे आम नागरिकों को तस्करों के खिलाफ बोलने का साहस मिलेगा। लेकिन इसके साथ यह खतरा भी बना रहेगा कि कहीं निर्दोष लोग झूठी सूचनाओं का शिकार न हो जाएं, या यह योजना गलत हाथों में ‘व्यवसाय’ न बन जाए। इसलिए इस योजना को पारदर्शी, प्रामाणिक और न्यायपूर्ण बनाना आवश्यक होगा।
सुक्खू सरकार की इच्छाशक्ति की परीक्षा :-अभियान का उद्देश्य इसे जन आंदोलन बनाना है, और यह लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है जब अभियान केवल रैलियों तक न सीमित रहकर पुलिस, प्रशासन और समाज—तीनों की संयुक्त रणनीति बने। यह भी ध्यान रखने योग्य है कि नशे का कारोबार केवल हिमाचल की आंतरिक समस्या नहीं; यह पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और सीमा पार से संचालित बड़े तस्करी नेटवर्क का हिस्सा है। यदि मुख्य स्रोतों पर प्रहार नहीं होगा, तो सड़क स्तर पर की गई कार्रवाई केवल सतही उपचार ही रहेगी।
हिमाचल प्रदेश एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मुख्यमंत्री सुक्खू की इस पहल में ऊर्जा है, दिशा है और जनता का समर्थन भी दिख रहा है। लेकिन यह लड़ाई केवल जागरूकता से नहीं जीती जाएगी। नशे की जड़ पर प्रहार करना होगा—मुख्य सौदागरों पर, आपूर्ति की नसों पर, और तस्करी के अंतरराज्यीय तंत्र पर।हिमाचल तभी सच में “चिट्टा-मुक्त” होगा जब नीति, कार्रवाई और इच्छाशक्ति तीनों एक साथ खड़ी हों। अभी शुरुआत हुई है—असली परीक्षा तो अब शुरू होती है।

