कथा: दो मित्र और दो वृक्ष
एक गाँव में दो गहरे मित्र रहते थे— नरेश और कमलेश। दोनों साथ खेलते, साथ पढ़ते और साथ-साथ बड़े हो रहे थे।नरेश स्वभाव से सरल और शांत था। जबकि कमलेश जल्द ही किसी के भी प्रभाव में आ जाता था।
दुष्ट-संग का प्रभाव — पहला वृक्ष
गाँव के बाहर दो वृक्ष थे।एक वृक्ष के नीचे कुछ शराबी और जुआरी रोज़ बैठकर गाली-गलौज करते थे।कमलेश अक्सर उनके पास बैठ जाता।वह कहता, “मैं तो बस सुनने जाता हूँ, क्या फर्क पड़ता है?”धीरे-धीरे कमलेश की भाषा बदलने लगी।उसका व्यवहार कटु हो गया उसकी दिनचर्या बिगड़ने लगी।अब लोग उससे कतराने लगे।वह वही वृक्ष बन गया जिसके आसपास केवल नकारात्मकता जमा रहती थी।
संत-संग का प्रभाव — दूसरा वृक्ष
दूसरा वृक्ष थोड़ा दूर था, जहाँ रोज़ एक संत बैठकर राम कथा सुनाते थे।नरेश रोज़ वहाँ जाता, शांत बैठकर कथा सुनता।
उसके मन में धैर्य, शांति और मधुरता आने लगी।उसका व्यवहार इतना सुन्दर हो गया कि गाँव के लोग उससे सलाह लेने लगे।
वह उस वृक्ष जैसा बन गया, जिसकी छाया में बैठने से मन ठंडा हो जाता है।
मोड़ — दर्पण जैसा संग
एक दिन संत ने कमलेश को बुलाकर कहा—“बेटा, वृक्ष तो एक-से हैं, पर साधक और दुष्ट उनके वातावरण को बदल देते हैं।
तुम्हारा मन भी उसी ओर झुकता है जहाँ तुम बैठते हो। मन संग का दर्पण है— जैसा संग, वैसा रंग।”कमलेश को बात समझ आ गई।
उसने दुष्ट संग छोड़ दिया और संत संग अपनाया।कुछ ही दिनों में उसका स्वभाव बदलने लगा।वह शांत, मधुर और विनीत हो गया।
“बेटा, आग के पास बैठे रहो तो धुआँ ही सही पर लगेगा ज़रूर।इसी तरह बुरी संगति मन को काला कर देती है।परंतु चंदन के पास बैठो तो उसकी खुशबू बिना मांगे मिलती है।इसलिए संगदोष त्याग कर संतों की संगति करना ही जीवन की उन्नति है।”बुरी संगति धीरे-धीरे मन को दूषित कर देती है— बिना जाने, बिना चाहे।संत-संग मन को शांत, पवित्र और उज्ज्वल बनाता है।जीवन का रंग संग से ही निकलता है— “जैसा संग, वैसा रंग।”

