भरमाड/नन्यूज़ इंडिया आजतक/ संपादक राम प्रकाश वत्स
पतित पावन सिद्ध आश्रम भरमाड़ में 70वाँ वार्षिक श्री शिवमहापुराण अखंड पाठ एवं संत सम्मेलन प्रारंभ
पतित पावन सिद्ध आश्रम भरमाड़ में 70वाँ वार्षिक श्री शिवमहापुराण अखंड पाठ एवं संत सम्मेलन बड़े भक्तिभाव और श्रद्धा के साथ आरंभ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री श्री 108 महामण्डलेश्वर परम श्रेय श्री गुरुदेव महन्त सतीश वत्स जी ने की।
आज प्रातःकाल शिवमहापुराण अखंड पाठ का भोग डाला गया, जिसके उपरांत शांति महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने पूर्ण आहुति डालकर लोक-कल्याण, शांति और सुख-समृद्धि की कामना की।
सम्मेलन की प्रथम बैठक में अपने आशीर्वचन प्रदान करते हुए
श्री श्री 108 महामण्डलेश्वर महन्त सतीश वत्स जी ने प्रवचनों की अमृतवर्षा करते हुए कहा कि—
“मानव जीवन तभी सार्थक बनता है जब उसमें सेवा, सदाचार और शिवभाव का समन्वय हो। शिवमहापुराण हमें सत्पथ पर चलने, आपसी भाईचारे को बढ़ाने और समाज में प्रेम एवं आत्मिक शक्ति जगाने की प्रेरणा देता है। जो व्यक्ति शिव तत्व को अपने अंतःकरण में धारण कर लेता है, उसके जीवन से न negativity रहती है न ही कोई भय।”
“सत्संग की महिमा अपरंपार है।” यह वाक्य केवल आध्यात्मिक कथन नहीं, बल्कि जीवन के परम सत्य का अनुभव है। जिस प्रकार गंदे और मलीन जल में जब शुद्ध करने वाला चूर्ण डाला जाता है तो वह धीरे-धीरे सारा मैल नीचे बैठा देता है और पानी निर्मल हो उठता है—उसी तरह सत्संग का पवित्र प्रभाव हमारे मन के भीतर जमी हुई मलिनता, द्वेष, क्रोध, लोभ और भ्रम को शांत करता हुआ उसे शुद्धता की ओर ले जाता है। मनुष्य के जीवन में जो अंधकार, जो उलझनें और जो मानसिक विषाक्तताएँ समय के साथ जमा हो जाती हैं, वे सत्संग की सुगंधित हवा में धीरे-धीरे उड़ जाती हैं।
दीन मन, थका हुआ मन, टूटा हुआ मन—जब सत्संग के दिव्य वातावरण में प्रवेश करता है, तो उसे ऐसा लगता है मानो किसी ने उसके पैरों की धूल झाड़कर उसे नए मार्ग पर चलने की शक्ति दे दी हो। सत्संग केवल ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि आत्मा को दिशा देने वाली वह दिव्य प्रक्रिया है, जिसमें मनुष्य स्वयं से सामना करता है। सत्संग हृदय में वह दीया जलाता है जिसकी लौ में वासनाएँ और विकार स्वतः ही भस्म होते जाते हैं।
जब मन शुद्ध होता है, तो स्वाभाविक रूप से ईश्वर के चरणों में दृढ़ लगन जागृत होती है। श्रद्धा का यह उद्गम किसी बाहरी प्रेरणा से नहीं, बल्कि भीतर के जागरण से होता है—और यही जागरण सत्संग का वास्तविक वरदान है। इंद्रियों की चंचलता और मन की अस्थिरता के बीच जब साधक सत्संग रूपी नौका पर चढ़ता है, तो उसे जीवन-सागर पार करने का आश्वासन मिल जाता है। सत्संग मनुष्य को केवल धार्मिक नहीं बनाता, बल्कि जागरूक, संवेदनशील और विनम्र बनाता है।
सत्संग की विशेषता यह है कि वह जीवन को दिव्यता की ओर मोड़ देता है। जैसे सूर्य का प्रकाश अंधकार को मिटा देता है, वैसे ही संतों की वाणी जीवन के संदेहों, भय और निराशा को दूर कर देती है। सत्संग में बैठने वाला मनुष्य चाहे कितना ही दुखी क्यों न आया हो, वहां से उठते समय उसके चेहरे पर शांति की लकीरें उभर आती हैं। क्यों? क्योंकि सत्संग उसे यह एहसास करा देता है कि वह अकेला नहीं है—उसके भीतर ईश्वर का अंश है, और वह जीवन की किसी भी कठिनाई को विजय में बदल सकता है।
जहाँ सत्संग है, वहाँ कल्याण अपने-आप जन्म ले लेता है। वहां न कोई दिखावा है, न कोई भ्रम; सिर्फ सत्य, प्रेम, करुणा और सद्विचारों का पवित्र प्रवाह। सत्संग हृदय को विनम्र बनाता है, विचारों को उज्ज्वल करता है और कर्मों को पवित्र दिशा प्रदान करता है। यही कारण है कि सत्संग को आत्मा का भोजन कहा गया है—जिससे मनुष्य के भीतर पवित्रता और सद्गुणों की खेती होती है।
दीन पैरों वाले, थके मन वाले, भ्रमित मन वाले—सबके लिए सत्संग एक दिव्य आश्रय है। जो भी व्यक्ति नियमित रूप से सत्संग का आश्रय लेता है, उसके जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर होकर ज्ञान का प्रकाश फैलने लगता है। सत्संग मनुष्य को बाहरी जगत से भीतर की यात्रा पर ले जाता है, जहाँ ईश्वर का प्रेम, सत्य की अनुभूति और कल्याण का मार्ग स्वयं प्रकट होता है।
उन्होंने आगे कहा कि धर्म-सम्मेलनों और आध्यात्मिक आयोजनों का उद्देश्य केवल अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मकता, सद्भाव और संस्कारों का संचार करना है।

