न्यूज़ इंडिया आजतक कार्यालय भरमाड , राजनीतिक विश्लेषक /संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश पर्यटन, प्राकृतिक संसाधनों, जलविद्युत क्षमता और औद्योगिक संभावनाओं से भरा हुआ राज्य है, लेकिन एक कटु सत्य यह भी है कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में यहाँ रेलवे नेटवर्क सबसे निचले पायदान पर है। जहाँ भारत के अधिकांश राज्यों में रेलवे विकास ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुँच चुका है, वहीं हिमाचल प्रदेश अभी भी रेलवे कनेक्टिविटी के मामले में लगभग शून्य जैसी स्थिति में खड़ा है। वर्तमान में केवल कालका-शिमला, पठानकोट–जोगिन्दरनगर और ऊना–चंडीगढ़–दौलतपुर चौक जैसी सीमित लाइनों तक ही रेलवे का दायरा पहुँच पाया है, जिनका दायरा प्रदेश के केवल 8–10% क्षेत्र तक सीमित है। शेष 90% हिमाचल आज भी रेलवे नेटवर्क से वंचित है।
रेलवे, विकास और जन–जीवनपरिवहन किसी भी राज्य के विकास की रीढ़ होता है। सड़क मार्ग का दबाव बढ़ता जा रहा है, और भारी वाहनों की आवाजाही से सड़कें बार-बार क्षतिग्रस्त भी होती हैं। यदि हिमाचल के बड़े भाग में रेलवे पहुँचता है, तो पर्यटन को नई उड़ान मिलेगी, उद्योगों को सुरक्षित ढुलाई सुविधा मिलेगी, जलविद्युत परियोजनाओं और कृषि–उत्पादों की सप्लाई आसान होगी। यही नहीं, पहाड़ी राज्यों में सड़कों पर हादसों की बढ़ती संख्या का एक विकल्प भी रेलवे हो सकता है
सिर्फ सीमाएँ ही नहीं, संभावनाएँ भी अनंत
हिमाचल प्रदेश के अधिकतर जिले रेलवे से नहीं जुड़े, लेकिन संभावनाएँ मौजूद हैं—
कांगड़ा से मंडी via जोगिन्दरनगर
हमीरपुर–बिलासपुर–शिमला कनेक्शन
चम्बा और पांगी घाटी तक कनेक्टिविटी
टूरिज़्म कॉरिडोर: मनाली–कीरतपुर–लेह तक विस्तारित रेल महत्वाकांक्षाआज जब भारत में वंदे भारत, मालगाड़ी कॉरिडोर और सेमी हाईस्पीड रेलें नए भविष्य की रचना कर रही हैं, तो हिमाचल को इससे पीछे नहीं रहना चाहिए।
वर्तमान प्रमुख परियोजनाएँ
सरकारें प्रयास कर रही हैं और कुछ परियोजनाएँ निर्माण/योजना में हैं
चंडीगढ़–बद्दी रेल लाइनयह औद्योगिक कस्बों तक सीधी रेल सुविधा देगा। इस लाइन के कई हिस्से को एलिवेटेड ट्रैक तैयार किया जा रहा है, जिससे भू–संतुलन और वन क्षेत्र कटाव कम होगा।भानुपल्ली–बिलासपुर–बेरी रेल लाइनहिमाचल की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक। यह लाइन बिलासपुर, हमीरपुर और आसपास के इलाकों को बड़ी कनेक्टिविटी से जोड़ेगी। परंतु इसकी लागत लगभग ₹6753 करोड़ है, जो परियोजना को वित्तीय चुनौती बनाता है।नंगल–तलवाड़ा विस्तार भूमि अधिग्रहण के कारण वर्षों से अटका। पूरा होने पर कांगड़ा और ऊना जिलों के लिए बड़ा लाभ होगा।राज्य सरकार के अनुरोध पर केंद्र द्वारा घोषणाएँ तो हुई हैं, पर निर्माण की गति धीमी है।
चुनौतियाँ क्यों खड़ी रहती हैं?
वित्तीय बाधाएँकई परियोजनाएँ इसलिए रुकी रहीं क्योंकि राज्य सरकार द्वारा समय पर भुगतान नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने भी कई बार यह मुद्दा उठाया कि बकाया राशि साफ होने तक निर्माण आगे नहीं बढ़ेगा।पर्वतीय भूगोलसुरंगें, पुल, ढलान नियंत्रण—हिमाचल में रेलवे निर्माण देश के अन्य मैदानों जितना आसान नहीं। लागत दोगुनी, समय तीन गुना लग जाता है।भूमि अधिग्रहण पहाड़ी गाँवों में भूमि सीमित होती है। लोग खेतों के बदले उचित मुआवज़ा और पुनर्वास चाहते हैं—यह प्रक्रिया समय लेती है।राजनीतिक प्राथमिकता की कमीसरकारें आती-जाती रहीं, घोषणाएँ होती रहीं… लेकिन हिमाचल के रेलवे विकास पर ठोस नीतिगत गति नहीं दिखी।
अब समय क्या मांगता है?
हिमाचल के प्रत्येक जिले को रेल नेटवर्क से जोड़ने का रोडमैप बनाया जाए केंद्र–राज्य मिलकर विशेष फंड बनाएँ।पर्यटन और औद्योगिक कॉरिडोर आधारित रेल योजना।जहाँ संभव हो इलेक्ट्रिक या सेमी–हाईस्पीड पैसेंजर रेल।अटल टनल की तरह आधुनिक तकनीक के साथ सुरंग–मार्ग रेलवेहिमाचल की सीमाएँ बाधा नहीं हैं, बल्कि आधुनिक इंजीनियरिंग के दौर में तकनीकी उपलब्धियाँ हर चुनौती का समाधान दे सकती हैं
सारगर्भित है कि हिमाचल प्रदेश में रेलवे का विस्तार विकास का विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। पर्यटन, व्यापार, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य—सबकी पहुँच रेल से बेहतर होती है। आज जब देश का हर राज्य अपनी रेलवे क्षमता बढ़ा रहा है, हिमाचल को सिर्फ दर्शक बनकर नहीं बैठना चाहिए। राज्य सरकार को कठोर निर्णय लेने होंगे, भूमि अधिग्रहण से लेकर वित्तीय प्रबंधन तक। केंद्र सरकार को हिमाचल को विशेष दर्जा देते हुए नई परियोजनाओं पर तेजी से काम करना चाहिए।यदि पहाड़ों में सड़कें बन सकती हैं, सुरंगें खोदी जा सकती हैं, तो रेल क्यों नहीं? सवाल यही है—इच्छाशक्ति कब जागेगी? हिमाचल के लोगों को इंतजार नहीं, तेज रफ्तार विकास चाहिए।एक विकसित हिमाचल के लिए रेलवे नेटवर्क अब सपना नहीं, आने वाला सच होना चाहिए।

