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शिक्षा के नाम पर मनमानी क्यों?पाठ्यक्रम बदला, नुकसान बच्चों का

RamParkash Vats
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न्यूज़ इंडिया आजतकडाट काम कार्यालय भरमाड (KANGRA.H.P.) -संपादक राम प्रकाश वत्स Mob:-88947-23376

शिक्षा तब ही पवित्र कहलाती है, जब वह ईमानदारी और समानता की नींव पर खड़ी हो। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा 294 निजी स्कूलों की मान्यता रद्द किए जाने का निर्णय पूरे राज्य के शैक्षिक तंत्र को झकझोर देने वाला है। पहली दृष्टि में यह निर्णय कठोर प्रतीत होता है, परंतु जब पृष्ठभूमि में छिपी वास्तविकता सामने आती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल कानून का पालन करवाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि बच्चों के हितों की रक्षा का आवश्यक कदम है। मान्यता प्राप्त स्कूलों के लिए बोर्ड की पुस्तकें पढ़ाना अनिवार्य था, किंतु लगभग तीन सौ विद्यालयों ने नियमों और अनुबंध को दरकिनार कर बाहरी प्रकाशकों की पुस्तकें पढ़ाईं। यह कोई साधारण भूल नहीं—यह शिक्षा की मूल आत्मा से छल है।

दरअसल, जब कोई स्कूल मान्यता प्राप्त करता है, तो वह सरकार, बोर्ड, अभिभावक और विद्यार्थियों के प्रति एक वचन लेता है कि वह निर्धारित पाठ्यक्रम और नियमों का पालन करेगा। यह अनुबंध केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि शैक्षिक व्यवस्था की रीढ़ है। किंतु इन विद्यालयों ने इस अनुबंध को भंग करते हुए बच्चों को ऐसे पाठ्यक्रम पढ़ाए, जिनकी न तो शिक्षा बोर्ड ने समीक्षा की, न ही स्वीकार्यता दी। इससे न केवल पाठ्यक्रम की एकरूपता भंग हुई, बल्कि बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को भी मानसिक और शैक्षणिक हानि पहुँची। सवाल यह है—क्या निजी लाभ शिक्षा से बड़ा है?

यह भी किसी से छिपा नहीं कि कई निजी प्रकाशकों की पुस्तकें अत्यधिक महंगी होती हैं। अनेक अभिभावक वर्षों से शिकायत करते आए हैं कि स्कूल विशेष दुकानों से पुस्तकें खरीदने का दबाव डालते हैं, और यह पूरा चक्र शिक्षा से अधिक व्यापार का है। जब शिक्षा व्यवसाय बन जाए और बच्चों की पुस्तकें लाभ कमाने का साधन, तब यह समझना कठिन नहीं कि असली नुकसान किसका होता है। महंगी पुस्तकें, असमान पाठ्यक्रम और बोर्ड से अलग सामग्री—यह सब मिलकर विद्यार्थियों के भविष्य पर बोझ ही बनता है, ज्ञान नहीं।

स्वाभाविक है कि कुछ लोग इस कार्रवाई को कठोर कहेंगे। वे यह भी तर्क देंगे कि बच्चों का सत्र बीच में खराब होगा। परंतु यह भी सत्य है कि यदि नियमों का उल्लंघन बिना दंड छोड़ दिया जाए, तो शिक्षा बोर्ड और कानून—दोनों का अस्तित्व केवल नाममात्र रह जाएगा। अनुशासन किसी भी व्यवस्था की आत्मा है, और यदि शिक्षा में ही अनुशासन भंग होने लगे, तो समाज का चरित्र कमजोर पड़ता है। शिक्षा बोर्ड का यह कदम केवल दंड नहीं, बल्कि संदेश है कि नियम पुस्तकों में लिखकर धूल खाने के लिए नहीं होते—वे पालन के लिए बने हैं।

अब आगे की राह यह है कि बच्चों को किसी भी प्रकार की अकादमिक हानि न हो। बोर्ड को उचित वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि विद्यार्थी निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप आगे बढ़ सकें। यदि संबंधित स्कूल अपनी भूल स्वीकार कर सुधार करते हैं, तो कठोर शर्तों के साथ पुनः मान्यता दी जा सकती है। परंतु यह तभी, जब वे यह सिद्ध करें कि शिक्षा उनके लिए व्यवसाय नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।

अंततः, इस पूरे संपादकीय लेख में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा का केंद्र छात्र है, संस्था नहीं। स्कूल चाहे निजी हों या सरकारी, उद्देश्य एक ही होना चाहिए—समान, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा। यह निर्णय कठोर अवश्य है, पर समय की दृष्टि से आवश्यक भी। क्योंकि यह नियमों की जीत नहीं—बच्चों के भविष्य की रक्षा की दिशा में उठाया गया साहसिक कदम है।

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