यह केवल विचार नहीं, बल्कि समय की पुकार है।
क्योंकि जब राजनीति नैतिकता से दूर होती है, तो लोकतंत्र अपनी दिशा खो देता है।
और जब जीत का भूत सिर पर सवार होता है, तो हार जनता की होती है —
वही जनता, जिसके नाम पर सत्ता की यह बाज़ी खेली जा रही है।
कहते हैं, जब “जीत का भूत” सिर पर सवार हो जाता है, तो न तो नैतिकता दिखाई देती है, न ही जनहित की परवाह रहती है। यही दृश्य आज बिहार (विहार) के चुनावी रण में देखने को मिल रहा है। विकास, शिक्षा, बेरोज़गारी, कृषि और स्वास्थ्य जैसे असल मुद्दे चुनावी मंच से गायब हैं। उनकी जगह ले ली है व्यक्तिगत आरोपों, धार्मिक बहसों और राजनीतिक बदज़ुबानी ने।
आज राजनीति एक ऐसा अखाड़ा बन चुकी है, जहाँ वाद–विवाद नहीं, बल्कि अपशब्द और आक्षेप फेंके जाते हैं। टीवी चैनलों पर चलने वाली चुनावी बहसें अब ज्ञानवर्धक नहीं, बल्कि तमाशा बन चुकी हैं। जिन प्रवक्ताओं को नीति और दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए, वे अब शब्दों के योद्धा बन गए हैं। उनकी भाषा में न संयम दिखता है, न संस्कृति की झलक। मर्यादा और संवाद की परंपरा को वे लाइव बहसों में कुचलते हुए नज़र आते हैं।
विडम्बना यह है कि यही सब लोकतंत्र के नाम पर हो रहा है। जनता को भ्रम में डालने के लिए धर्म और जाति की राजनीति को हथियार बना लिया गया है। सभी राजनीतिक दल किसी न किसी रूप में हिंदू धर्म को निशाना बनाते हैं, जबकि अन्य धर्मों की आलोचना से परहेज़ करते हैं। शायद यह चुनावी रणनीति का हिस्सा हो, परंतु यह प्रवृत्ति समाज में धार्मिक असंतुलन और मानसिक विषाक्तता फैला रही है। राजनीति अब जनसेवा नहीं, बल्कि धर्म-आधारित समीकरणों की जुगलबंदी बन गई है।
विहार चुनाव में बार-बार ऐसे बयान सुनने को मिलते हैं जो समाज में विभाजन की रेखाएँ और गहरी कर देते हैं। जब प्रवक्ता टीवी स्क्रीन पर अपनी पार्टी के नेताओं के अर्थहीन, भड़काऊ और समाज-विरोधी बयानों का बचाव करते हैं, तो यह समझना कठिन नहीं कि आज का राजनीतिक विमर्श किस दिशा में जा रहा है। ऐसे में विकास, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, या युवाओं के रोजगार जैसे सवाल गौण हो जाते हैं — और जनता के असली हित, भाषणों और नारों की भीड़ में गुम हो जाते हैं।
चुनावी सभाओं में इस्तेमाल की जा रही भाषा का प्रदूषण किसी ज़हरीली धुंध से कम नहीं।
यह लोकतंत्र की आत्मा को धीरे-धीरे ग्रस रहा है।राजनीति अब वह कला नहीं रही, जो समाज में एकता, शांति और प्रगति का संदेश देती थी — बल्कि यह अब अवमानना, अहंकार और आक्रोश का खेल बन गई है।
मेरे संपादकीय चिंतन में यह स्पष्ट रूप से उभरता है कि आज भारत को जितनी ज़रूरत आर्थिक सुधारों या तकनीकी प्रगति की है, उतनी ही ज़रूरत राजनीतिक चरित्र निर्माण की भी है।यह आवश्यक है कि देश में एक “नेता चरित्र निर्माण विश्वविद्यालय” स्थापित किया जाए, जहाँ भावी राजनेताओं को दो वर्ष का नैतिक, प्रशासनिक और सामाजिक प्रशिक्षण दिया जाए, और उसके बाद एक वर्षों की व्यवहारिक प्रैक्टिस करवाई जाए।जैसे डॉक्टर या वकील बिना प्रमाणपत्र के कार्य नहीं कर सकते, वैसे ही बिना पात्रता प्रमाणपत्र के कोई व्यक्ति राजनीति में प्रवेश न कर सके। नहीं तो(नीम हकीम खतरे जान) की स्थिति उत्पन्न होती है जैसे विहार में चुनावी उत्सव में देखने को मिल रहा है ।क्योंकि नेताओं और चिकित्सकों की गलती का परिणाम भयंकर होता है जिसका इलाज नहीं होता।

