मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हाल ही में स्वीकार किया कि राज्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत नाजुक है, और यदि सरकार “नीम की कड़वाहट” जैसे कठोर आर्थिक निर्णय नहीं लेती, तो भविष्य में संकट और गहराएगा।
संकट की जड़ें : विकास के साथ बढ़ता कर्ज :-हिमाचल प्रदेश, जो कभी अपनी प्राकृतिक संपदा, सामाजिक समरसता और शैक्षिक प्रगति के लिए देश में उदाहरण माना जाता था, आज गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। यह संकट अचानक नहीं आया; यह उन नीतियों और आर्थिक निर्णयों का परिणाम है जो बीते वर्षों से निरंतर कर्ज पर टिकी विकास-व्यवस्था को पोषित करते रहे। राज्य की आय सीमित रही, पर व्यय लगातार बढ़ता गया — परिणामस्वरूप आज हर नागरिक पर औसतन लाखों रुपये का कर्ज चढ़ चुका है।सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य की वित्तीय स्थिति इतनी जटिल हो चुकी है कि कर्ज चुकाने के लिए भी नए कर्ज लेने पड़ रहे हैं। ऐसे में विकास योजनाएँ “ऋण-निर्भर” बन गई हैं, आत्मनिर्भर नहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में हिमाचल ने सराहनीय कार्य किए, परंतु इन उपलब्धियों की कीमत भारी उधारी के रूप में चुकानी पड़ी। यह व्यवस्था टिकाऊ नहीं रह सकती। अब यह समझने का समय है कि बिना आर्थिक अनुशासन और राजस्व सुदृढ़ीकरण के कोई भी समाज लंबे समय तक “कर्ज आधारित विकास” का भार नहीं उठा सकता।
वर्तमान परिदृश्य : दो पाटों में पिसता राज्य:-मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हाल ही में स्वीकार किया कि राज्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत नाजुक है, और यदि सरकार “नीम की कड़वाहट” जैसे कठोर आर्थिक निर्णय नहीं लेती, तो भविष्य में संकट और गहराएगा। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वास्तविकता को सामने लाती है — हिमाचल दो पाटों में पिस रहा है: एक ओर बढ़ता कर्ज और दूसरी ओर रुकी हुई योजनाएँ।राजस्व स्रोत सीमित हैं; पर्यटन, जलविद्युत और कृषि जैसे पारंपरिक क्षेत्र पर्याप्त आमदनी नहीं दे पा रहे। केंद्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता भी शर्तों और देरी में उलझी रहती है। परिणामस्वरूप सरकार को टैक्स बढ़ाने, बिजली और पानी के बिलों में वृद्धि जैसे कदम उठाने पड़ते हैं, जिनका सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। ग्रामीण और मध्यम वर्गीय परिवार, जो पहले ही महँगाई की मार झेल रहे हैं, अब सरकारी सेवाओं के लिए भी अधिक भुगतान करने को मजबूर हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है — क्या विकास का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित रह गया है, या फिर जनता की वास्तविक आर्थिक राहत भी उसका हिस्सा है?
राजनीतिक दृष्टिकोण : जनहित से अधिक दलहित:-यह आर्थिक संकट किसी एक सरकार या दल की देन नहीं है, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग की साझा विफलता है। बीते चार दशकों में सत्ता परिवर्तन तो बार-बार हुआ, पर आर्थिक नीतियों की दिशा वही रही — कर्ज लेकर योजनाएँ बनाना, फिर अगले कार्यकाल में उसी कर्ज को चुकाने के लिए नए कर्ज लेना।राजनीतिक दलों ने दीर्घकालिक सुधारों के बजाय तात्कालिक राहत देने वाली “लोकलुभावन नीतियाँ” अपनाईं। मुफ्त बिजली, पेंशन, भत्ते और सब्सिडी जैसी योजनाएँ जनता को कुछ समय के लिए राहत तो देती हैं, पर राज्य की आर्थिक रीढ़ कमजोर करती हैं। किसी भी राजनीतिक दल ने राजस्व बढ़ाने या व्यय नियंत्रण की ठोस नीति नहीं अपनाई।जनता का भी इसमें कुछ अंश योगदान रहा है — क्योंकि हम सभी ने उन नीतियों को सराहा जो तात्कालिक लाभ देती हैं, भले ही दीर्घकालिक नुकसान क्यों न हो। यह समय आत्ममंथन का है — न केवल सरकारों के लिए, बल्कि समाज के लिए भी। जब तक जनता आर्थिक अनुशासन और पारदर्शिता को चुनावी मुद्दा नहीं बनाएगी, तब तक “वित्तीय सुधार” केवल घोषणाओं तक सीमित रहेंगे।
समाधान की राह : इच्छाशक्ति और जनसहयोग:-अब समय है कि हिमाचल सरकार “सत्ता सुख” के मोह से ऊपर उठकर राज्य की आर्थिक सेहत सुधारने की दिशा में ठोस कदम उठाए। इसके लिए सबसे पहले पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन की आवश्यकता है — हर योजना की लागत, लाभ और फंडिंग के स्रोत को स्पष्ट किया जाए। अनावश्यक सरकारी खर्चों में कटौती हो, और हर विभाग से उत्तरदायित्व तय किया जाए।राजस्व बढ़ाने के लिए पर्यटन, बागवानी और औद्योगिक क्षेत्रों में निजी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। हिमाचल की जलविद्युत क्षमता का उपयोग स्थायी आय स्रोत के रूप में किया जाए, न कि केवल ऋण चुकाने के लिए। साथ ही, स्थानीय उत्पादों को “हिमाचल ब्रांड” के रूप में राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार में उतारने की रणनीति तैयार करनी होगी।सबसे महत्वपूर्ण है राजनीतिक इच्छाशक्ति — क्योंकि आर्थिक सुधार सदैव लोकप्रिय नहीं होते, परंतु दीर्घकाल में वही राज्य को आत्मनिर्भर बनाते हैं। मुख्यमंत्री सुक्खू ने जिस “नीम की कड़वाहट” का उल्लेख किया, वह दरअसल हिमाचल की अर्थव्यवस्था के उपचार की पहली दवा है। इस कड़वे इलाज में जनता का सहयोग, पारदर्शी शासन और दूरदर्शी नीतियाँ ही राज्य को कर्ज के जाल से मुक्त कर सकती हैं।हिमाचल को फिर से आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए सरकार, समाज और नागरिकों — तीनों की साझी जिम्मेदारी है। यही वह क्षण है जब हमें यह तय करना होगा कि हम “कर्ज आधारित राज्य” बने रहना चाहते हैं या “स्वावलंबी हिमाचल” का सपना साकार करना चाहते हैं।
यह विषय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक चेतना का भी प्रश्न है। अनुभव हमें यही सिखाता है कि उधारी से समृद्धि नहीं आती; स्थायित्व और आत्मनिर्भरता ही असली विकास का मार्ग हैं। हिमाचल यदि अब भी सही दिशा में कदम उठाए, तो आने वाला दशक उसका स्वर्णकाल बन सकता है।

