जीवन का अमृत : जल का महत्व :जल पृथ्वी पर जीवन का मूल तत्व है। बिना जल के न तो मानव जीवन संभव है और न ही प्रकृति का संतुलन। विश्व के लगभग 71 प्रतिशत हिस्से पर जल फैला हुआ है, परंतु उसमें से मात्र 2.5 प्रतिशत मीठा जल है, जो पीने योग्य है। भारत जैसे विशाल देश में जहां नदियाँ सभ्यता की जननी रही हैं — गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, नर्मदा, सतलुज जैसी नदियों ने न केवल कृषि को जीवन दिया, बल्कि सांस्कृतिक धारा को भी निरंतर प्रवाहित रखा। किंतु बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, अनियोजित शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से यह जल-संपदा अब संकटग्रस्त हो चली है।राष्ट्रीय जल नीति (2023) के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 में जहाँ 5,000 घनमीटर प्रतिवर्ष थी, वहीं आज यह घटकर लगभग 1,400 घनमीटर रह गई है — यानी हम “जल तनाव” की श्रेणी में आ गए हैं। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो वर्ष 2050 तक भारत की आधी आबादी को जल संकट झेलना पड़ सकता है। यह स्थिति बताती है कि जल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।भारत की नदियाँ हिमालय और पठारों से निकलकर पूरे देश में जीवन का संचार करती हैं, लेकिन इनका वैज्ञानिक और संतुलित प्रबंधन अभी भी चुनौती बना हुआ है। हिमालयी नदियाँ — गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र — मानसूनी वर्षा और ग्लेशियर पिघलने से संचालित होती हैं। वहीं दक्कन की नदियाँ — गोदावरी, कृष्णा, कावेरी — वर्षा पर निर्भर हैं। बढ़ते शहरी कचरे, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक और अवैध खनन ने इन नदियों को प्रदूषित कर दिया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, देश की 351 नदियाँ प्रदूषित श्रेणी में हैं।नदी प्रबंधन के लिए “नदी बेसिन आधारित योजना” आवश्यक है, जिसमें नदी को एक इकाई के रूप में देखा जाए — स्रोत से मुहाने तक। उदाहरण के लिए, गंगा नदी के लिए “नमामि गंगे मिशन” ने कुछ सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं। इस परियोजना के अंतर्गत 400 से अधिक सीवेज उपचार संयंत्र लगाए गए और लाखों टन कचरे का निस्तारण किया गया। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में छोटे जल स्रोतों — चश्मों, बावड़ियों और कुओं — के पुनर्जीवन के लिए “जल संरक्षण अभियान” चलाए जा रहे हैं। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे जलागम क्षेत्रों में वृक्षारोपण, वर्षा जल संचयन और प्राकृतिक झीलों के संरक्षण को प्राथमिकता दे। जल संरक्षण केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। पारंपरिक भारत में जल संरक्षण की अद्भुत परंपराएँ थीं — राजस्थान के जोहड़, गुजरात के वाव, हिमाचल के खूल और उत्तराखंड के गुल इसके सजीव उदाहरण हैं। आज समय है कि इन परंपराओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए। वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को हर घर, स्कूल और उद्योग तक पहुंचाना होगा। एक अनुमान के अनुसार, यदि देश के हर शहरी घर की छत से वर्षा जल संग्रह किया जाए, तो भारत अपने कुल जल उपयोग का लगभग 30% स्वयं ही बचा सकता है।कृषि क्षेत्र में, जो भारत के कुल जल उपयोग का 80% हिस्सा लेता है, सूक्ष्म सिंचाई (micro-irrigation) — जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली — को बढ़ावा देना आवश्यक है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) ने इस दिशा में प्रगति की है, लेकिन इसे हर किसान तक पहुँचाना अभी बाकी है। उद्योगों में “जल पुनर्चक्रण” (recycling) और “शून्य उत्सर्जन नीति” (Zero Liquid Discharge) को अपनाना चाहिए। शहरों में पुनर्नवीनीकृत जल का उपयोग पार्कों, निर्माण कार्यों और सफाई में किया जा सकता है। नागरिक स्तर पर, पानी की बर्बादी रोकने, रिसाव ठीक करने और जागरूकता फैलाने की संस्कृति विकसित करनी होजल का दूसरा रूप तब विनाशकारी हो जाता है जब वह बाढ़ या भूस्खलन के रूप में प्रकट होता है। भारत में हर साल लगभग 75 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित होती है, जिससे अरबों रुपये की क्षति होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी बारिश का स्वरूप अनियमित हो गया है — कभी बादल फटते हैं, तो कभी लम्बे सूखे। हिमाचल, उत्तराखंड, असम और बिहार जैसे राज्यों में यह समस्या अधिक गंभीर है। बाढ़ प्रबंधन के लिए केवल तटबंध बनाना ही पर्याप्त नहीं है; इसके लिए समग्र दृष्टिकोण चाहिए — जैसे जलाशयों का वैज्ञानिक उपयोग, नदी मार्ग की सफाई, ड्रेनेज सुधार, और उपग्रह आधारित पूर्वानुमान प्रणाली।भारत सरकार की राष्ट्रीय जल मिशन और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने मिलकर बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली (Flood Early Warning System – FEWS) विकसित की है, जो रियल-टाइम डाटा के आधार पर जोखिम क्षेत्रों को चिन्हित करती है। इसके अलावा, जल-भंडारण संरचनाएँ जैसे बाँध, झीलें और तालाब, जब योजनाबद्ध तरीके से बनाए जाते हैं, तो वे बाढ़ नियंत्रण में भी सहायक बनते हैं। साथ ही, हमें यह समझना होगा कि नदियों का स्वाभाविक प्रवाह ही उनका जीवन है; अत्यधिक बाँध निर्माण या नदी मार्गों का कृत्रिम मोड़ पारिस्थितिक असंतुलन को जन्म देता है। अतः जल प्रबंधन का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाना है “जल प्रबंधन केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का विषय है। जब तक समाज “जल को जीवन” की दृष्टि से नहीं देखेगा, तब तक कोई नीति कारगर नहीं होगी। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि हर बूंद की कीमत है। गांवों में तालाबों का पुनर्निर्माण, शहरों में जल-निकासी व्यवस्था का पुनर्गठन, उद्योगों में पुनर्चक्रण की अनिवार्यता, और प्रशासनिक स्तर पर नीति का कड़ा क्रियान्वयन — यही “अमृतकाल” का जल दृष्टिकोण होना चाहिए।भारत ने “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के साथ “एक जल, सर्वजन जल” का भी संकल्प लेना होगा। क्योंकि जल ही वह सेतु है जो खेत, कारखाना, घर और प्रकृति — सभी को जोड़ता है। जल प्रबंधन में सफलता तभी संभव है जब विज्ञान, समाज और शासन तीनों एक साथ काम करें। तभी हमारी नदियाँ स्वच्छ रहेंगी, खेत हरियाली से भरेंगे और आने वाली पीढ़ियाँ उस धरती पर सांस लेंगी, जो जल से नहीं, जीवन से परिपूर्ण होगी।
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