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दशहरा : धर्म, मर्यादा और विजय का पर्व

RamParkash Vats
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भारत की संस्कृति, दर्शन और जीवन दृष्टि को यदि एक वाक्य में समझाना हो तो कहा जा सकता है कि यहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर का स्वरूप है। हमारे ऋषियों ने न केवल मानव जीवन, बल्कि पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति, नदियाँ, पर्वत और यहाँ तक कि निर्जीव पदार्थों को भी भगवान का अंश माना है। यही दृष्टिकोण भारत के सनातन धर्म को सर्वश्रेष्ठ, सार्वभौमिक और सर्वव्यापक बनाता है। इसीलिए कहा गया है –

“ईशावास्यमिदं सर्वं, यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
(इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से आच्छादित है।)

इसी दार्शनिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में भारतीय पर्व-त्योहारों की परंपरा पनपी है। इनमें दशहरा या विजयदशमी विशेष महत्व रखता है। यह पर्व केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की प्रेरणा देने वाला पर्व है।

श्रीरामचरितमानस और मर्यादा का आदर्श

दशहरा या विजयदशमी, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अनेक स्तरों पर है –

भारतीय जीवन में शस्त्र केवल हिंसा का साधन नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का साधन है। इसीलिए दशहरे के दिन तलवार, धनुष-बाण, भाला आदि शस्त्रों की पूजा की जाती है।

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