मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है और बार-बार प्राप्त नहीं होता। यह ईश्वर का अमूल्य उपहार है जिसे केवल सांसारिक मोह-माया में गँवाना उचित नहीं है। इस जीवन का सार तभी है जब हम मानवता, सदाचार और परोपकार के मार्ग पर चलें। ऐसा जीवन जियो कि जब तुम इस संसार को छोड़कर भगवत शरण में जाओ तो लोग तुम्हें देवताओं के समान स्मरण करें। यही सच्ची अमरता है। रामायण मानव जीवन का सर्वोत्तम मार्गदर्शक ग्रंथ है, जो न केवल धर्म, नीति और कर्तव्य का ज्ञान देता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि संसार में रहते हुए आदर्श आचरण और मर्यादा कैसे निभाई जाए। श्रीराम का चरित्र यह प्रेरणा देता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सत्य, करुणा और धर्म का पालन ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है। अतः मानव जन्म का उपयोग ऐसे कर्मों में करो, जिससे ईश्वर की कृपा भी प्राप्त हो और समाज तुम्हें आदर्श रूप में स्मरण करे——-Editor Mahant Ram Parkash Vats Astrologar

भारत की संस्कृति, दर्शन और जीवन दृष्टि को यदि एक वाक्य में समझाना हो तो कहा जा सकता है कि यहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर का स्वरूप है। हमारे ऋषियों ने न केवल मानव जीवन, बल्कि पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति, नदियाँ, पर्वत और यहाँ तक कि निर्जीव पदार्थों को भी भगवान का अंश माना है। यही दृष्टिकोण भारत के सनातन धर्म को सर्वश्रेष्ठ, सार्वभौमिक और सर्वव्यापक बनाता है। इसीलिए कहा गया है –
“ईशावास्यमिदं सर्वं, यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
(इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से आच्छादित है।)
इसी दार्शनिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में भारतीय पर्व-त्योहारों की परंपरा पनपी है। इनमें दशहरा या विजयदशमी विशेष महत्व रखता है। यह पर्व केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की प्रेरणा देने वाला पर्व है।
सनातन धर्म और ब्रह्मांड-दृष्टि
भारतीय संस्कृति में ब्रह्मांड को जीवंत सत्ता माना गया है। हर वस्तु को ईश्वर का रूप मानकर उसका आदर और संरक्षण करना हमारी परंपरा है। यही कारण है कि –वृक्षों को “देववृक्ष” कहा गया, तुलसी, पीपल, वट और अश्वत्थ का पूजन किया गया।नदियों को “माता” माना गया – गंगा, यमुना, सरस्वती आज भी हमारे आस्था का केंद्र हैं।सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, वायु और पृथ्वी को देवताओं की उपमा दी गई।गाय को “माता” और “कृष्ण की प्रिय” मानकर पूजनीय बनाया गया।यह दृष्टि हमें सिखाती है कि प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे जीवन का पोषण और संरक्षण करने वाली शक्ति है। यही भाव दशहरे के पर्व में भी झलकता है, जब हम शस्त्र और शास्त्र दोनों की पूजा करते हैं।
श्रीरामचरितमानस और मर्यादा का आदर्श
भारत की संस्कृति का सबसे बड़ा आधार श्रीरामचरितमानस है। तुलसीदास ने इसमें न केवल राम की कथा लिखी, बल्कि संपूर्ण मानव जीवन के लिए आदर्श प्रस्तुत किया।श्रीराम ने गृहस्थ जीवन जीते हुए यह सिद्ध किया कि धर्म और मर्यादा का पालन सबसे बड़ा धर्म है।भाई, पत्नी, माता-पिता, प्रजा और राष्ट्र – सभी के प्रति मर्यादित व्यवहार कैसे होना चाहिए, यह राम के जीवन से हमें सीखने को मिलता है।जब राजा दशरथ ने उन्हें वनवास दिया, तब उन्होंने पिता की आज्ञा मानकर राज्य, सुख और ऐश्वर्य त्याग दिया।सीता माता ने साथ जाकर पतिव्रता धर्म का पालन किया।लक्ष्मण ने भ्रातृ-भक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया।हनुमान ने भक्ति और सेवा का सर्वोच्च उदाहरण स्थापित किया।इस प्रकार रामायण केवल कथा न होकर गृहस्थ जीवन और राष्ट्र जीवन का संविधान है।

दशहरे का धार्मिक महत्व
दशहरा या विजयदशमी, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अनेक स्तरों पर है –
राम-रावण युद्ध का अंत –
त्रेतायुग में श्रीराम ने रावण का वध करके अधर्म पर धर्म की विजय प्राप्त की। तभी से दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।
माता दुर्गा की विजय –
देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण के अनुसार, दशहरे के दिन माता दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध किया। इसीलिए यह दिन देवी-शक्ति की विजय के रूप में भी पूजनीय है।
अर्जुन द्वारा शस्त्र पूजन –
महाभारत के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने शमी वृक्ष में अपने शस्त्र छिपा दिए थे। विजयदशमी के दिन उन्होंने उन शस्त्रों को पुनः धारण कर कौरवों पर विजय पाई। तभी से शस्त्र पूजन की परंपरा आरंभ हुई।शमी पूजन और कृषि परंपरा –
दशहरे पर शमी वृक्ष की पूजा की जाती है। इसे कृषि जीवन में समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।

दशहरे के अनुष्ठान
शस्त्र पूजन –
भारतीय जीवन में शस्त्र केवल हिंसा का साधन नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का साधन है। इसीलिए दशहरे के दिन तलवार, धनुष-बाण, भाला आदि शस्त्रों की पूजा की जाती है।
शास्त्र पूजन –
विद्या और ज्ञान को सर्वोच्च मानते हुए ग्रंथों, पुराणों और रामचरितमानस जैसे धर्मग्रंथों की पूजा भी की जाती है।
रावण दहन –
बुराई के प्रतीक रावण का पुतला जलाकर समाज को यह संदेश दिया जाता है कि हमें अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, काम और लोभ का दहन करना चाहिए।
नवरात्रि का समापन –
दशहरा नवरात्रि के नौ दिनों की साधना और देवी उपासना के उपरांत विजय का दिन है। इसे आत्मिक शक्ति और साधना का फल माना जाता है।
धार्मिक आधार पर महत्त्वपूर्ण विवेचना
धर्म और अधर्म का संघर्ष
दशहरा हमें सिखाता है कि जीवन में हमेशा धर्म की रक्षा करनी चाहिए। अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उसकी पराजय निश्चित है।आत्मविजय का संदेश
रावण केवल बाहरी राक्षस नहीं है, बल्कि हमारे भीतर छिपे दस दोषों – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, ईर्ष्या और हिंसा – का प्रतीक है। दशहरा हमें इन दोषों पर विजय पाने का संकल्प देता है।स्त्री-शक्ति का महत्व
इस पर्व में माँ दुर्गा की आराधना और विजय की स्मृति हमें यह बताती है कि स्त्री-शक्ति के बिना धर्म और समाज का संतुलन असंभव है।
- राष्ट्र और समाज के प्रति उत्तरदायित्व
श्रीराम ने रावण-वध केवल सीता जी को मुक्त कराने के लिए नहीं, बल्कि समाज और विश्व को आतंक और अन्याय से मुक्त करने के लिए किया। इससे हमें प्रेरणा मिलती है कि हम भी राष्ट्र और समाज के कल्याण हेतु अपने कर्तव्य निभाएँ।
दशहरा : सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से
भारत में दशहरे का पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है।उत्तर भारत में रामलीला का भव्य आयोजन होता है।पश्चिम बंगाल में इसे “दुर्गा पूजा” के रूप में मनाया जाता है।महाराष्ट्र में शमी पूजन और परस्पर “शमी पत्र” बांटने की परंपरा है।कर्नाटक के मैसूर दशहरे की भव्यता विश्व प्रसिद्ध है।आंध्र, तमिलनाडु और केरल में भी देवी-पूजन और उत्सव होते हैं।इस प्रकार दशहरा पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोने वाला पर्व है।आधुनिक जीवन में दशहरे का संदेश आज जब भौतिकवाद और उपभोक्तावाद बढ़ रहा है, तब दशहरा हमें याद दिलाता है कि –
सत्य और धर्म ही शाश्वत हैं।
जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, अंततः धर्म की ही विजय होती है।बुराइयों और नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागना ही सच्चा विजयदशमी उत्सव है।राष्ट्र और समाज की रक्षा, परिवार की मर्यादा और मानवता का पालन हर व्यक्ति का कर्तव्य है।दशहरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आत्मा है। यह हमें सिखाता है कि –धर्म और सत्य की राह पर चलना ही जीवन का उद्देश्य है।मर्यादा, त्याग और कर्तव्य पालन से ही समाज और राष्ट्र मजबूत बनता है।बुराई चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो, अंततः अच्छाई ही विजय पाती है।अतः हमें इस दिन केवल रावण के पुतले नहीं जलाने चाहिए, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों का भी दहन करना चाहिए। तभी दशहरे का पर्व अपने सच्चे अर्थों में सफल होगा।

