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संपादकीय मंथन और चिंतन: “हिमाचल में प्लास्टिक पाबंदी काग़ज़ों तक सीमित, सरकार के आदेशों के बावजूद पॉलिथीन का बोलबाला—स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बन चुका है गंभीर ख़तरा”

RamParkash Vats
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“घातक रसायनों से भरा प्लास्टिक जीवन की ज़रूरत बन चुका, कार्रवाई गरीब दुकानदारों तक सीमित; थोक विक्रेताओं और फैक्ट्रियों पर सरकार अब भी खामोश क्यों?”

हिमाचल प्रदेश ने सबसे पहले अपने को पॉलिथीन फ्री राज्य घोषित करने का दावा किया था। सरकार के आदेश आए, कानून बने, जुर्माने तय हुए, लेकिन आज भी हालात यह हैं कि प्रदेश के 90 प्रतिशत लोग प्लास्टिक का उपयोग कर रहे हैं। यह स्थिति केवल प्रशासन की कमजोरी ही नहीं, बल्कि समाज की उदासीनता को भी दर्शाती है।

बिस्फेनॉल-ए (BPA): हार्मोन असंतुलन और कैंसर का बड़ा कारण।फ्थेलेट्स (Phthalates): बच्चों के विकास और प्रजनन क्षमता पर खतरनाक असर।पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC): जलने पर डाइऑक्सिन जैसी ज़हरीली गैस छोड़ता है, जो लाइलाज बीमारियों को जन्म देती है।स्टायरिन (Styrene): तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचाता है।सीसा (Lead) और कैडमियम (Cadmium): हड्डियों और गुर्दों को धीरे-धीरे नष्ट करते हैं।यही कारण है कि प्लास्टिक से पैक खाने-पीने की चीजें शरीर में धीरे-धीरे ज़हर घोल रही हैं। कैंसर, हार्मोनल रोग, प्रजनन समस्याएं और सांस की बीमारियां इसके सीधे परिणाम हैं।

हिमाचल की नदियां, घाटियां और जंगल प्लास्टिक कचरे से पट रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्र में जब यह कचरा जलाया जाता है तो उससे निकलने वाला धुआं पूरे पर्यावरण को विषैला बना देता है। जानवर थैलियां निगलकर दम तोड़ रहे हैं और मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही है।

वास्तविक कसौटी पर देखा जाए तो प्लास्टिक संकट की जिम्मेदारी केवल किसी एक पक्ष पर नहीं थोपी जा सकती, बल्कि सरकार, संबंधित विभाग और जनता—तीनों समान रूप से दोषी हैं। सरकार ने पाबंदी तो घोषित कर दी, परंतु व्यवहारिक विकल्प सस्ते और सुलभ नहीं बनाए; विभागों ने खानापूर्ति वाली छापेमारी कर गरीब दुकानदारों को निशाना बनाया, जबकि बड़े आपूर्तिकर्ताओं और फैक्ट्रियों पर आंख मूंद ली; और जनता ने सुविधा व आलस्य के चलते प्लास्टिक का उपयोग जारी रखा, जबकि उसके दुष्प्रभावों से पूरी तरह वाकिफ़ हैयह त्रिकोणीय लापरवाही ही असल कारण है कि पाबंदी मज़ाक बनकर रह गई और प्लास्टिक का जाल समाज, स्वास्थ्य और पर्यावरण को लगातार जकड़ रहा है।

  1. सख्त कार्रवाई: थोक विक्रेताओं और अवैध फैक्ट्रियों पर सीधी कार्रवाई।
  2. जनजागरूकता: स्कूल स्तर से ही बच्चों को प्लास्टिक मुक्त जीवन की शिक्षा।
  3. सरकारी जवाबदेही: यदि सरकारी कार्यक्रमों और दफ्तरों में ही प्लास्टिक बोतलें और ग्लास चलेंगे, तो आम जनता पर पाबंदी मज़ाक ही लगेगी।

प्लास्टिक से मुक्ति का सबसे प्रभावी विकल्प प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल सामग्री को बढ़ावा देना है।

प्लास्टिक केवल एक सुविधा नहीं है, यह धीरे-धीरे हमारे शरीर और पर्यावरण को खोखला कर रहा है। हिमाचल जैसे संवेदनशील पर्यावरणीय प्रदेश में यदि इस पर नियंत्रण नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियां इसे हमारी सबसे बड़ी भूल मानेंगी।

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