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संपादकीय मंथन और चिंतन:भ्रष्टाचार और पारदर्शिता: लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती

RamParkash Vats
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दूसरा मुद्दा चुनावी चंदा और राजनीतिक दलों की फंडिंग से जुड़ा है। चुनाव आयोग का अनुमान है कि लोकसभा चुनावों में अरबों रुपये खर्च होते हैं, जिनमें अधिकांश धन कॉर्पोरेट चंदों और अघोषित नकदी से आता है। पारदर्शिता लाने के नाम पर शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की आलोचना हुई कि यह दानदाताओं और दलों दोनों की पहचान छिपाती है, जिससे लोकतंत्र पर कॉर्पोरेट दबाव और बढ़ता है। यदि राजनीतिक दल उद्योगपतियों पर निर्भर रहेंगे तो नीतियाँ भी उन्हीं के अनुकूल बनेंगी और आम जनता के मुद्दे पीछे छूट जाएँगे। समाधान यही है कि राजनीतिक दलों की आय-व्यय का स्वतंत्र ऑडिट हो और सभी चंदों का विवरण सार्वजनिक किया जाए।

तीसरा पहलू निगरानी संस्थाओं की निष्प्रभाविता से जुड़ा है। लोकपाल, सीबीआई, सीवीसी और सीएजी जैसी संस्थाओं की स्थापना भ्रष्टाचार रोकने के लिए हुई, परंतु इनकी प्रभावशीलता सीमित रही है। लोकपाल की नियुक्ति में देरी और राजनीतिक हस्तक्षेप ने उसकी छवि को कमजोर किया है। सीबीआई और सीवीसी पर “पिंजरे का तोता” होने के आरोप लगते रहे हैं। वहीं, सीएजी की रिपोर्टें कई घोटालों का खुलासा करती हैं, किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में उन पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती। इन संस्थाओं को वास्तविक स्वतंत्रता और बाध्यकारी अधिकार देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

चौथा पहलू महिलाओं के प्रतिनिधित्व का है। आधी आबादी होने के बावजूद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत से भी कम है। 1996 से लंबित महिला आरक्षण विधेयक बार-बार राजनीतिक मतभेदों की भेंट चढ़ता रहा। पंचायत स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण का सकारात्मक असर स्पष्ट दिखाई देता है, जहाँ महिलाएँ नीति-निर्माण और नेतृत्व में सार्थक भूमिका निभा रही हैं। इसलिए संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण अब केवल आवश्यकता ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के साथ न्याय का प्रश्न भी है।

पाँचवाँ मुद्दा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़ा है। भारत की विविधता उसकी शक्ति है, किंतु यदि अल्पसंख्यक समुदाय भय और असुरक्षा में जीवन जीने को मजबूर हों तो लोकतंत्र कमजोर होता है। संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद सांप्रदायिक दंगे, भेदभाव और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन अल्पसंख्यकों के सामने बड़ी चुनौती हैं। दुर्भाग्य से इनके अधिकारों को अक्सर वोट-बैंक की राजनीति से जोड़ा जाता है। वास्तविक सुधार के लिए शिक्षा और रोजगार में विशेष योजनाएँ, दंगों पर त्वरित न्याय और अल्पसंख्यक आयोग को अधिक शक्तिशाली बनाना आवश्यक है।

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