
2025 का मानसून हिमाचल प्रदेश के लिए विनाशकारी साबित हुआ, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि प्राकृतिक आपदाएं केवल आकाश से नहीं टपकतीं, बल्कि हमारे असंतुलित विकास मॉडल का भी नतीजा होती हैं। जंगलों का अवैध कटान, नदियों के बहाव में अवरोध और अनियंत्रित भवन निर्माण ने त्रासदी को और विकराल बना दिया। ऐसे में जरूरी है कि संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित कर वहां विशेष सुरक्षा उपाय किए जाएं, बांधों की संरचना को मजबूत किया जाए और आपदा प्रबंधन को तकनीकी व सामाजिक दृष्टि से और सशक्त बनाया जाए। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही हिमाचल और देश का भविष्य सुरक्षित रह सकता है।
हिमाचल प्रदेश को 2025 के मानसून ने जो गहरे घाव दिए हैं,
हिमाचल प्रदेश को 2025 के मानसून ने जो गहरे घाव दिए हैं, वे केवल प्राकृतिक आपदा का परिणाम भर नहीं हैं, बल्कि यह मानव की असंवेदनशील विकास नीति और अव्यवस्थित संसाधन प्रबंधन की एक सख्त चेतावनी भी है। सैकड़ों परिवार उजड़ गए, हजारों लोग बेघर हुए और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हुई। पहाड़ों के सीने पर पड़ी यह चोटें केवल हिमाचल की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चिंतन और मंथन का विषय हैं।2.प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन मानवीय संसाधनों और वैज्ञानिक योजनाओं से इनके असर को अवश्य कम किया जा सकता है। इसके लिए सरकार, प्रशासन और स्थानीय समुदायों को एक साझा रणनीति पर काम करना होगा। बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली, समय पर चेतावनी तंत्र और राहत-कार्य में आधुनिक तकनीक का उपयोग पहाड़ी राज्य को भविष्य की त्रासदियों से बचाने का रास्ता दिखा सकता है।
“पहाड़ की पीड़ा और सबक:
प्रकृति के साथ संतुलन की पुकार”आज की सबसे बड़ी समस्या है – प्रकृति से छेड़छाड़। जंगलों का अवैध कटान, पहाड़ों पर अनियंत्रित खुदाई, नदी-नालों के बहाव में अवरोध और पर्वतीय क्षेत्रों में अनियंत्रित भवन निर्माण ने आपदाओं को और विकराल बना दिया है। यदि इस दोहन पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले वर्षों में हिमाचल की पारिस्थितिकी और अधिक असंतुलित होगी, जिसका खामियाज़ा केवल पहाड़ ही नहीं बल्कि मैदान और पूरा देश भुगतेगा।
“बारिश का कहर और मानवीय भूलें: कब आएगी समझदारी?”
इस वर्ष जिन क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएं अधिक हुई हैं, उन्हें “अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र” घोषित कर विशेष निगरानी में रखा जाना चाहिए। वहां रहने वाली आबादी के लिए सुरक्षित आश्रय, पुनर्वास योजनाएं और जोखिम प्रबंधन पर आधारित नीतियां तैयार करनी होंगी। केवल चेतावनी देना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने और उनके जीविकोपार्जन के साधनों की रक्षा करने की ठोस रणनीति बनानी होगी।
हिमाचल प्रदेश की सुरक्षा में बांधों और जलाशयों की संरचना भी एक अहम पहलू है।
केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर इन बांधों की मजबूती और आपात प्रबंधन योजनाओं पर गंभीरता से काम करना चाहिए। आज कई बांध पुराने हो चुके हैं, जिनकी क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। इनकी समय-समय पर तकनीकी जांच और मरम्मत न होने पर यह खतरा बन सकते हैं।
.बांधों से छोड़े जाने वाले आपातकालीन पानी की वैज्ञानिक रूप से योजना बनाकर लोगों के जान-माल की रक्षा करना अनिवार्य है।
इसके लिए न केवल इंजीनियरिंग दृष्टिकोण चाहिए बल्कि स्थानीय समाज को भी इसमें शामिल करना होगा। हिमाचल की यह त्रासदी हमें यह सिखाती है कि विकास का अर्थ केवल सड़कें और इमारतें खड़ी करना नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना ही सच्चा सतत विकास है। यदि हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाले मानसून और भी भयावह तस्वीरें लेकर लौटेंगे।

