न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
आर्थिक दबाव झेलने में भारत की जनता सक्षम है, भारत की जनता के लिए देश सर्वोपरि है।
हाल ही में अमेरिका ने भारत से आयातित उत्पादों पर टैरिफ को 50% तक बढ़ा दिया है। यह निर्णय दो चरणों में लागू हुआ—पहले जुलाई 2025 में 25% और फिर 27 अगस्त 2025 को अतिरिक्त 25% जोड़कर। इस कदम ने भारतीय निर्यात उद्योग और घरेलू व्यापार पर गहरा असर डाला है। अमेरिका का तर्क है कि भारत रूस से सस्ता तेल और रक्षा सामान खरीदना जारी रखे हुए है तथा द्विपक्षीय व्यापार में असंतुलन भी उसके लिए चिंता का विषय है। लेकिन यह टैरिफ नीति वैश्विक व्यापार संबंधों को और जटिल बना रही है।
सबसे ज्यादा प्रभावित भारत के श्रमप्रधान उद्योग हुए हैं। आभूषण, कपड़ा, झींगा, कालीन, चमड़ा, ऑटो पार्ट्स और रसायन जैसे क्षेत्र, जिन पर लाखों परिवारों की आजीविका निर्भर है, अब अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा खो रहे हैं। विशेष रूप से MSME सेक्टर, जो भारत के कुल निर्यात में लगभग 45% योगदान करता है, अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। अनुमान है कि अमेरिका को होने वाला भारत का निर्यात करीब 43% तक गिर सकता है, जिससे लगभग 48 अरब डॉलर का सीधा नुकसान और लाखों नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है।
भारत सरकार और अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि इस टैरिफ विवाद के द्वितीयक और तृतीयक प्रभाव भी सामने आएंगे—जैसे घरेलू उत्पादन में गिरावट, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और विदेशी निवेशकों की अनिश्चितता। इससे न केवल निर्यातकों की आय घटेगी बल्कि व्यापक स्तर पर भारत की आर्थिक वृद्धि पर भी दबाव बढ़ेगा। वैश्विक स्तर पर भारत की छवि एक स्थिर और भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार के रूप में चुनौती झेल सकती है।
ऐसे में भारत को संतुलित रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। अल्पकालिक तौर पर सरकार को प्रभावित निर्यातकों और MSME सेक्टर को वित्तीय सहायता व कर राहत देनी होगी। मध्यम अवधि में अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता घटाकर यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बाजारों में व्यापार विविधीकरण बढ़ाना जरूरी है। साथ ही, दीर्घकालिक दृष्टि से तकनीकी नवाचार, गुणवत्ता सुधार और घरेलू सुधार तेज करना ही एक स्थायी समाधान है। यदि भारत समझदारी से इन नीतियों को लागू करता है, तो यह संकट उसके लिए अवसर में भी बदल सकता है।

