अभी हाल मे मैक्लोडगंज में पहली प्रति भेंट करना भी उनके लिए विशेष मायने रखता है। उनकी प्रशासनिक सेवा और पारिवारिक जीवन का बड़ा हिस्सा हिमाचल प्रदेश से जुड़ा रहा है। पिछले दिनों आई ए एस अधिकारी राकेश प्रजापति शिमला में इस उपन्यास को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सखू और प्रतिपक्ष नेता जय राम ठाकुर से भी भेंट करने के बाद उन्हें इसके बारे में बतायाl *

नूरपुर से विनय महाजन :-नूरपुर राकेश प्रजापति आई ए एस का बहुत चर्चित उपन्यास आजकल देश में और प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है l जिस प्रकार इस उपन्यास मे एक दादा और उनके पोते के भावनात्मक रिश्ते पर आधारित है उसमें रिश्ते के माध्यम से यह प्रेम, महत्वाकांक्षा और आंतरिक शांति की तलाश करने का प्रयास करता है। इन सभी विषयों को एक सरल प्रश्न जोड़ता है। जीवन को वास्तव में सार्थक क्या बनाता है?अनेक भारतीयों के बचपन की यादें अपने दादा-दादी और नाना-नानी से जुड़ी होती हैं। इनमें सोते समय सुनी गई कहानियां, बातचीत से मिली सीख और निःस्वार्थ प्रेम के पल शामिल होते हैं।

ये अनुभव चुपचाप बच्चों के व्यक्तित्व को आकार देते हैं।लेकिन आज इस निकटता को बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। परिवार अलग-अलग शहरों में रहते हैं। दिन का बड़ा हिस्सा काम में बीत जाता है। साथ बैठकर बिताया जाने वाला समय अब अक्सर स्क्रीन के सामने गुजरता है। पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ने पर स्नेह तो बना रहता है, लेकिन उसे व्यक्त करने के अवसर कम हो जाते हैं।उपन्यास अपने केंद्रीय रिश्ते के माध्यम से इस बदलाव को सामने लाता है। यह समझने का प्रयास करता है कि बुजुर्गों के लिए समय न होने पर युवा पीढ़ी क्या खो सकती है। उनके साथ के अलावा, वह उनके अनुभव, धैर्य और उनसे मिलने वाले अपनेपन से भी वंचित हो सकती है।परिवार की इस आत्मीय दुनिया से कहानी वयस्क जीवन के व्यापक दबावों की ओर बढ़ती है। पोते की यात्रा उन महत्वाकांक्षाओं पर प्रश्न उठाती है, जिनके पीछे लोग भागते हैं। साथ ही, यह रास्ते में किए जाने वाले त्याग पर भी विचार करती है।भारत में सफलता को अक्सर अंकों, परीक्षाओं, नौकरियों और पदों से मापा जाता है। युवा इन लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए वर्षों मेहनत करते हैं। परिवार उनके संघर्ष में साथ देते हैं और उनकी उपलब्धियों पर खुश होते हैं।
फिर भी लक्ष्य हासिल कर लेना हमेशा वह खुशी नहीं देता, जिसकी उम्मीद की गई थी।उपन्यास सिविल सेवाओं की दुनिया के माध्यम से इसी दुविधा को परखता है। परीक्षा उत्तीर्ण करके आईएएस या आईपीएस बनना अनगिनत युवा भारतीयों का सपना है। इससे सामाजिक सम्मान और देश की सेवा का अवसर मिलता है। फिर कुछ युवा अधिकारी इन सेवाओं को छोड़ने का निर्णय क्यों लेते हैं?यह पुस्तक कथा के माध्यम से ऐसे निर्णयों के पीछे छिपे मानवीय प्रश्नों को सामने लाती है। क्या पेशेवर उपलब्धियां हर व्यक्तिगत जरूरत को पूरा कर सकती हैं? जब कोई सपना अपना नहीं लगता, तब क्या होता है?
वर्षों के प्रयास से बनाए गए जीवन पर दोबारा विचार करने का साहस कैसे मिलता है?ये प्रश्न केवल सिविल सेवाओं तक सीमित नहीं हैं। विद्यार्थी, कामकाजी लोग और माता-पिता इनमें अपने संघर्षों की झलक देख सकते हैं। कहानी सफलता की उनकी तलाश को प्रेम, उद्देश्य और शांति की गहरी आवश्यकता से जोड़ती है।
प्रजापति हिमाचल प्रदेश कैडर के 2012 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने जिला और राज्य स्तर पर विभिन्न दायित्व निभाए हैं। वर्तमान में वे भारत सरकार के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग में निदेशक हैं। बचपन के शुरुआती वर्ष अपने दादा के साथ बिताने के कारण उपन्यास का केंद्रीय रिश्ता उनके लिए व्यक्तिगत भावनात्मक महत्व भी रखता है।

