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नशा नहीं, मौत का रास्ता है यह कारोबार—प्यास अधूरी, परिवार बर्बाद और भविष्य अंधकारमय

RamParkash Vats
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नशे से दूरी, जीवन से जुड़ाव और तस्करी के आर्थिक नेटवर्क पर कानूनी प्रहार—यही एक सुरक्षित, स्वस्थ और नशामुक्त हिमाचल की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता हैं

नशे के अवैध कारोबार का दूसरा पक्ष उन लोगों से जुड़ा है, जो दूसरों की जिंदगी को नुकसान पहुंचाकर आर्थिक लाभ कमाने की कोशिश करते हैं।

नूरपुर में नशा तस्करों की संपत्तियां फ्रीज करने की कार्रवाई और इस विषय पर विधायक भवानी सिंह पठानिया का बयान एक व्यापक संदेश देता है

लेखक संसदीय क्षेत्र कांगड़ा -चंम्बा चीफ ब्यूरो विनय महाजन

नशे की लत इंसान को धीरे-धीरे मौत के दरवाजे तक ले जाती है। नशे की प्यास कभी बुझती नहीं, लेकिन इस प्यास की कीमत कई बार पूरे परिवार को चुकानी पड़ती है। जहां एक ओर नशे का आदी व्यक्ति अपना भविष्य खोता है, वहीं दूसरी ओर उसके माता-पिता की उम्मीदें टूटती हैं, बहन-बेटियों की आंखों के सपने धुंधले पड़ते हैं और बच्चों का बचपन आर्थिक तंगी तथा मानसिक तनाव की भेंट चढ़ जाता है। नशे का कारोबार केवल एक व्यक्ति को नहीं निगलता, बल्कि परिवार और समाज की नींव को भी कमजोर करता है।नशा आज समाज के सामने खड़ी उन गंभीर चुनौतियों में शामिल है, जिनसे निपटने के लिए केवल जागरूकता के नारे पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति, प्रभावी पुलिस कार्रवाई, नशा तस्करी से अर्जित संपत्तियों पर कानूनी शिकंजा और समाज की सामूहिक भागीदारी जरूरी है। हिमाचल प्रदेश में नशे के खिलाफ जारी कार्रवाई और नशा तस्करों की संपत्तियां फ्रीज करने के मामले में नूरपुर पुलिस की पहल इसी व्यापक चुनौती के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

नशे की प्यास बुझाने के चक्कर में उजड़ते घर

नशे की शुरुआत कई बार जिज्ञासा, दोस्तों के दबाव, गलत संगत या तनाव से बचने के बहाने होती है। लेकिन धीरे-धीरे यही आदत ऐसी निर्भरता में बदल सकती है, जिसमें व्यक्ति अपने स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पारिवारिक जिम्मेदारियों की अनदेखी करने लगता है। नशे की लत से जूझ रहे व्यक्ति के लिए इससे बाहर निकलना कठिन हो सकता है और परिवार के लिए उसे संभालना भावनात्मक तथा आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण बन जाता है।सबसे दुखद स्थिति तब पैदा होती है, जब माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए जीवनभर मेहनत करते हैं, लेकिन वही बच्चे नशे की गिरफ्त में आकर अपनी संभावनाएं खोने लगते हैं। घर की बचत इलाज, कर्ज और दूसरी जरूरतों में खर्च होने लगती है। रिश्तों में तनाव बढ़ता है और परिवार के सदस्य सामाजिक उपेक्षा तथा मानसिक पीड़ा का सामना करते हैं।

नशे की प्यास अजीब है—इसे बुझाने के लिए जितना आगे बढ़ा जाता है, नुकसान का दायरा उतना ही बढ़ सकता है। अंततः व्यक्ति के सामने स्वास्थ्य संकट, आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक अलगाव जैसी परिस्थितियां खड़ी हो सकती हैं। इसलिए नशे को केवल व्यक्तिगत आदत मानना उचित नहीं है। यह एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती भी है।

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तस्करों की कमाई पर चोट जरूरी

नशे के अवैध कारोबार का दूसरा पक्ष उन लोगों से जुड़ा है, जो दूसरों की जिंदगी को नुकसान पहुंचाकर आर्थिक लाभ कमाने की कोशिश करते हैं। इस कारोबार में शामिल लोगों के लिए नशा कमाई का जरिया हो सकता है, लेकिन इसकी सामाजिक कीमत युवाओं और उनके परिवारों को चुकानी पड़ती है।ऐसे में केवल नशे की खेप पकड़ना ही पर्याप्त नहीं है। अवैध कारोबार से जुड़े आर्थिक नेटवर्क की जांच करना, अपराध से अर्जित संपत्तियों की पहचान करना और कानून के तहत उन पर कार्रवाई करना भी महत्वपूर्ण है। जब जांच एजेंसियां तस्करी के आर्थिक आधार तक पहुंचती हैं, तो अवैध कारोबार से होने वाले लाभ पर अंकुश लगाने की संभावना बढ़ती है।

नूरपुर पुलिस द्वारा नशा तस्करी से अर्जित संपत्तियों को फ्रीज करने की कार्रवाई इसी दृष्टिकोण को सामने लाती है। उपलब्ध समाचार के अनुसार, इस कार्रवाई को लेकर फतेहपुर के विधायक एवं राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष भवानी सिंह पठानिया ने पुलिस की सराहना की है। उन्होंने कहा कि नशे के कारोबार पर लगाम लगाना मुख्यमंत्री और प्रदेश सरकार के विजन का हिस्सा है तथा इस अवैध धंधे में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।संपत्तियों को फ्रीज करने जैसी कार्रवाई का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि यह नशा तस्करी को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसके आर्थिक पक्ष पर भी ध्यान केंद्रित करती है। हालांकि, ऐसी प्रत्येक कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, उपलब्ध साक्ष्यों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के अनुरूप होनी चाहिए। कानून का निष्पक्ष पालन ही कार्रवाई की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को मजबूत करता है।

पुलिस की सख्ती के साथ समाज की जिम्मेदारी भी

नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या सरकार के भरोसे नहीं जीती जा सकती। पुलिस का दायित्व तस्करी के नेटवर्क को उजागर करना, कानून के अनुसार कार्रवाई करना और अवैध कारोबार पर अंकुश लगाना है। सरकार को नशामुक्ति सेवाओं, परामर्श, उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। वहीं, परिवारों, शिक्षण संस्थानों, पंचायतों, सामाजिक संगठनों और युवाओं को भी अपनी भूमिका निभानी होगी।विधायक भवानी सिंह पठानिया ने युवाओं से खेलों, सामाजिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यों से जुड़ने की अपील की है। यह संदेश महत्वपूर्ण है, क्योंकि युवाओं को केवल नशे के नुकसान बताना पर्याप्त नहीं है; उन्हें बेहतर विकल्प, अवसर और सकारात्मक वातावरण भी उपलब्ध कराना होगा।

खेल मैदानों की सक्रियता, विद्यालयों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम, युवाओं के लिए कौशल विकास, रोजगारपरक प्रशिक्षण और नशे से प्रभावित व्यक्तियों के लिए उपचार की सुविधा इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं। परिवारों को भी चाहिए कि वे नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को अपमानित करने के बजाय समय रहते विशेषज्ञ सहायता लेने के लिए प्रेरित करें।नशे की गिरफ्त में आया प्रत्येक व्यक्ति तस्कर नहीं होता। नशे की लत से पीड़ित लोगों को उपचार और सहानुभूति की जरूरत हो सकती है, जबकि नशे का अवैध कारोबार करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई आवश्यक है। इन दोनों स्थितियों में अंतर समझना एक संवेदनशील और प्रभावी नशामुक्ति अभियान के लिए जरूरी है।

नशामुक्त हिमाचल का सपना सामूहिक संकल्प से होगा साकार

नूरपुर में नशा तस्करों की संपत्तियां फ्रीज करने की कार्रवाई और इस विषय पर विधायक भवानी सिंह पठानिया का बयान एक व्यापक संदेश देता है

—नशे के अवैध कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए कार्रवाई निरंतर और प्रभावी होनी चाहिए। लेकिन इस अभियान की वास्तविक सफलता केवल दर्ज मामलों या फ्रीज की गई संपत्तियों के आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि नशे की उपलब्धता कितनी कम हुई, कितने युवाओं को समय पर सहायता मिली, कितने लोग उपचार के बाद सामान्य जीवन में लौटे और कितने परिवारों को टूटने से बचाया जा सका।

समाज को यह समझना होगा कि नशे की एक गलत शुरुआत किसी युवा के सपनों पर भारी पड़ सकती है। नशे का अवैध कारोबार करने वालों के लिए दूसरे व्यक्ति का भविष्य भले ही कमाई का साधन बन जाए, लेकिन प्रभावित परिवार के लिए यह जीवनभर का दर्द बन सकता है।नशे की प्यास अधूरी रह जाती है, मगर इसकी कीमत किसी मां की ममता, पिता की मेहनत, बहन की उम्मीद और बच्चों के भविष्य को चुकानी पड़ सकती है। इसलिए जरूरत केवल नशा बेचने वालों पर कानूनी शिकंजा कसने की नहीं, बल्कि नशे की मांग को कम करने, प्रभावित लोगों को बचाने और युवाओं को बेहतर जीवन की राह दिखाने की भी है।नूरपुर पुलिस की कार्रवाई को इसी व्यापक लक्ष्य से जोड़कर देखा जाना चाहिए। सरकार, पुलिस और समाज यदि मिलकर निरंतर प्रयास करें, तो नशे के अवैध कारोबार पर प्रभावी अंकुश लगाने और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में ठोस प्रगति संभव है।

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