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पौंग की लहरों से उठता संदेश: हिमाचल के स्कूलों में भी शुरू हों जल क्रीड़ाओं के पाठ

RamParkash Vats
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Head Office News India Ajj Tak-Writer Vijay Samyal (चिंतन ,मंथन और विश्लेषण)

हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता केवल पर्यटन का आकर्षण नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य को नई दिशा देने का एक सशक्त माध्यम भी बन सकती है। प्रदेश में ऊंचे पहाड़, बहती नदियां, झीलें और पौंग बांध जैसे विशाल जलाशय प्रकृति की अनमोल देन हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन संसाधनों को पर्यटन तक सीमित न रखते हुए शिक्षा, खेल और युवा विकास की नीतियों से जोड़ा जाए। फतेहपुर क्षेत्र में पौंग बांध की लहरों पर अंतर-महाविद्यालय कयाकिंग एवं कैनोइंग चैंपियनशिप का आगाज इसी संभावना की ओर संकेत करता है। वजीर राम सिंह राजकीय महाविद्यालय देहरी के तत्वावधान में आयोजित इस प्रतियोगिता में प्रदेश के 14 महाविद्यालयों की 21 टीमों की भागीदारी यह बताती है कि हिमाचल के युवाओं में जल क्रीड़ाओं के प्रति रुचि और प्रतिभा विकसित करने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। अब प्रश्न यह है कि जब महाविद्यालय स्तर पर ऐसे आयोजन हो सकते हैं, तो प्रदेश के विद्यालयों में खेलों की इस नई दुनिया के द्वार क्यों न खोले जाएं?

विद्यालयी शिक्षा में खेलों को मिले प्राथमिकता

हिमाचल प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए कि विद्यालयी शिक्षा के साथ-साथ खेलों को भी विद्यार्थियों के दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा कैसे बनाया जाए। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना, प्रमाणपत्र हासिल करना और रोजगार की दौड़ में आगे निकलना नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है, जो विद्यार्थियों को शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से मजबूत, अनुशासित और जिम्मेदार नागरिक बनाए।आज आवश्यकता ऐसे शिक्षा मॉडल की है, जिसमें कक्षा की पढ़ाई के साथ मैदान में पसीना बहाने, टीम के साथ काम करने, हार से सीखने और जीत को विनम्रता से स्वीकार करने का अवसर भी मिले। यदि विद्यालय स्तर से ही विद्यार्थियों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप खेलों से जोड़ा जाए, तो प्रदेश में खेल प्रतिभाओं की पहचान कम उम्र में की जा सकती है।पौंग बांध के आसपास के क्षेत्रों में जल क्रीड़ाओं की संभावनाओं को देखते हुए सरकार पायलट परियोजना के रूप में चयनित विद्यालयों में कयाकिंग और कैनोइंग के प्रति जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने पर विचार कर सकती है। हालांकि, इन गतिविधियों का संचालन प्रशिक्षित विशेषज्ञों, निर्धारित सुरक्षा मानकों, उपयुक्त बुनियादी ढांचे और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर ही होना चाहिए। प्रत्येक विद्यालय में जल क्रीड़ाएं शुरू करना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन जहां भौगोलिक परिस्थितियां अनुकूल हैं, वहां विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित प्रशिक्षण और परिचयात्मक शिविर आयोजित किए जा सकते हैं।

नशे के विरुद्ध खेल बन सकते हैं मजबूत आधार

पौंग बांध में आयोजित प्रतियोगिता के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि एवं जिला परिषद सदस्य रघुबीर पठानिया ने युवाओं से नशे से दूर रहने और खेलों को जीवन का हिस्सा बनाने की अपील की। उनका यह संदेश वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में विशेष महत्व रखता है।युवाओं को नशे से बचाने के लिए केवल भाषण, चेतावनी और जागरूकता रैलियां पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए उन्हें ऐसे सकारात्मक अवसर भी उपलब्ध कराने होंगे, जिनसे वे अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और समय का सार्थक उपयोग कर सकें। खेल इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। नियमित खेल गतिविधियां विद्यार्थियों में अनुशासन, आत्मविश्वास, लक्ष्य के प्रति समर्पण और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करने में मदद करती हैं।लेकिन यहां सरकार और समाज दोनों को एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। खेलों को नशामुक्ति का एकमात्र समाधान मानना उचित नहीं होगा। नशे की समस्या से निपटने के लिए परिवार, विद्यालय, स्वास्थ्य सेवाओं, परामर्श व्यवस्था, सामाजिक संगठनों और प्रशासन की संयुक्त भूमिका आवश्यक है। खेलों को इसी व्यापक अभियान का एक मजबूत हिस्सा बनाया जाना चाहिए।यदि प्रत्येक विद्यालय में विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार कम से कम एक खेल चुनने का अवसर मिले, पर्याप्त खेल सामग्री उपलब्ध हो और प्रशिक्षकों की व्यवस्था की जाए, तो बच्चों को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने का आधार मजबूत हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से ऐसी पहल की जरूरत है, जहां प्रतिभा तो है, लेकिन संसाधनों और मार्गदर्शन की कमी के कारण अनेक बच्चे आगे नहीं बढ़ पाते।

पौंग बांध को जल क्रीड़ा प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावना

पौंग बांध केवल जल भंडारण और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है। उचित योजना, पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा प्रबंधों के साथ यह क्षेत्र जल क्रीड़ाओं के विकास में भी योगदान दे सकता है। अंतर-महाविद्यालय प्रतियोगिता का आयोजन इस दिशा में संभावनाओं को सामने लाता है।प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह खेल विभाग, शिक्षा विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, संबंधित महाविद्यालयों और जल क्रीड़ा विशेषज्ञों के साथ मिलकर पौंग क्षेत्र में दीर्घकालिक योजना तैयार करने की संभावनाओं का आकलन करे। इसके अंतर्गत प्रशिक्षित कोच, आधुनिक उपकरण, सुरक्षा नौकाएं, जीवनरक्षक जैकेट, प्राथमिक उपचार, आपातकालीन बचाव व्यवस्था और प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान जैसे विषयों को प्राथमिकता दी जा सकती है।इसके साथ ही पर्यावरणीय संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी अनिवार्य है। पौंग बांध और उसके आसपास का क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी भी खेल गतिविधि का विस्तार संबंधित पर्यावरणीय नियमों, वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकताओं और अधिकृत एजेंसियों की अनुमति के अनुरूप होना चाहिए।यदि इन पहलुओं पर ध्यान देकर योजना बनाई जाए, तो पौंग क्षेत्र के स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण के अवसर मिल सकते हैं। भविष्य में योग्य खिलाड़ियों को राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंचाने के लिए भी एक व्यवस्थित मार्ग विकसित किया जा सकता है। इससे खेलों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार, प्रशिक्षण और खेल पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।

सरकार के सामने अवसर भी, जिम्मेदारी भी

हिमाचल प्रदेश सरकार के सामने यह अवसर है कि वह शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थियों के समग्र विकास पर अधिक ध्यान दे। इसके लिए विद्यालयों में खेल मैदानों की उपलब्धता, शारीरिक शिक्षा अध्यापकों की नियुक्ति, खेल सामग्री, नियमित प्रतियोगिताओं और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए विशेष प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा।साथ ही, ग्रामीण और दूरदराज के विद्यालयों के विद्यार्थियों को भी समान अवसर मिलने चाहिए। खेलों के विकास की योजना केवल बड़े शहरों या चुनिंदा संस्थानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। फतेहपुर, जवाली, नूरपुर, इंदौरा और कांगड़ा जैसे क्षेत्रों में उपलब्ध भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप खेल गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।सरकार चाहे तो चयनित विद्यालयों में खेल प्रतिभा पहचान कार्यक्रम शुरू कर सकती है। इसमें विद्यार्थियों की रुचि, शारीरिक क्षमता और उपलब्ध सुविधाओं के अनुसार अलग-अलग खेलों का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। जल क्रीड़ाओं में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए महाविद्यालयों और अधिकृत प्रशिक्षण केंद्रों के सहयोग से परिचयात्मक शिविर भी आयोजित किए जा सकते हैं।यह भी जरूरी है कि खेलों को केवल वार्षिक समारोह या प्रतियोगिता तक सीमित न रखा जाए। विद्यालयों में नियमित अभ्यास, खेल कैलेंडर, प्रशिक्षकों की उपलब्धता और विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ठोस व्यवस्था बनाई जाए।

पौंग की लहरों से निकले शिक्षा सुधार का संदेश

वजीर राम सिंह राजकीय महाविद्यालय देहरी की ओर से आयोजित अंतर-महाविद्यालय कयाकिंग एवं कैनोइंग चैंपियनशिप को केवल दो दिवसीय खेल आयोजन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह आयोजन इस बात पर विचार करने का अवसर भी देता है कि हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक परिस्थितियों और युवाओं की प्रतिभा का बेहतर उपयोग कैसे किया जा सकता है।मुख्य अतिथि रघुबीर पठानिया का युवाओं को नशे से दूर रहने और खेलों से जुड़ने का संदेश, महाविद्यालय की प्राचार्य कामाक्षी लुंभा का विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर जोर और प्रदेश के 14 महाविद्यालयों की 21 टीमों की भागीदारी एक सकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत करती है।अब जरूरत है कि इस सकारात्मक पहल को व्यापक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया जाए। हिमाचल प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग विद्यालय स्तर पर खेल सुविधाओं को मजबूत करने, जल क्रीड़ाओं की संभावनाओं का अध्ययन करने और योग्य विद्यार्थियों को सुरक्षित प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए ठोस नीति बनाने पर विचार करें।यदि प्रदेश के विद्यालयों में पढ़ाई के साथ खेलों को भी समान महत्व दिया जाए, तो हिमाचल का युवा केवल डिग्री हासिल करने वाला विद्यार्थी नहीं, बल्कि अनुशासित, आत्मविश्वासी, स्वस्थ और प्रतिस्पर्धी नागरिक बनकर उभर सकता है। पौंग बांध की लहरों पर शुरू हुई यह खेल गतिविधि इसी व्यापक सोच की ओर एक सार्थक संकेत है। अब देखना यह है कि इस संकेत को शिक्षा नीति में बदलाव और धरातल पर सुविधाओं के विस्तार में बदलने की पहल कब होती है।

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