चुनावी राजनीति के बीच नए जिलों का मुद्दा, जनता की उम्मीदों को कितना मिलेगा आधार? हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन के लिए आयोग बनाए जाने की चर्चा ने एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। देहरा, नूरपुर और रामपुर जैसे क्षेत्रों में जिला बनने की उम्मीदें फिर से जाग उठी हैं। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले नए जिलों का प्रश्न राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आना स्वाभाविक है, लेकिन इस मुद्दे को केवल चुनावी रणनीति या किसी राजनीतिक दल की उपलब्धि और चुनौती के रूप में देखना उचित नहीं होगा। वास्तव में यह प्रश्न प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे, भौगोलिक परिस्थितियों, जनता की सुविधाओं और विकास के समान अवसरों से जुड़ा है। यदि किसी क्षेत्र के नागरिकों को छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए जिला मुख्यालय तक पहुंचने में पूरा दिन लग जाता है, तो यह केवल दूरी का मामला नहीं, बल्कि उनके समय, धन और सरकारी सेवाओं तक पहुंच का भी सवाल है। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी राज्यों से बिल्कुल अलग हैं। यहां कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में भी दुर्गम सड़कों, पहाड़ी रास्तों और परिवहन की सीमाओं के कारण कई घंटे लग सकते हैं। इसलिए नए जिले बनाने की मांग को केवल राजनीतिक नारे के बजाय जनसुविधा के दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। राज्य सरकार द्वारा आयोग गठित किए जाने की पहल को इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। आयोग का गठन अपने आप में जिले बनने की गारंटी नहीं है, लेकिन यह उन क्षेत्रों के लिए उम्मीद का आधार जरूर बन सकता है, जहां लंबे समय से प्रशासनिक पुनर्गठन की मांग उठती रही है।
नूरपुर का दावा और भौगोलिक वास्तविकता, क्या अब मिलेगा प्रशासनिक न्याय? नूरपुर को जिला बनाने की मांग लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति और जनचर्चा का हिस्सा रही है। कांगड़ा जिले का भौगोलिक विस्तार बड़ा होने के कारण नूरपुर, फतेहपुर, इंदौरा और जवाली जैसे क्षेत्रों के नागरिकों के सामने जिला मुख्यालय धर्मशाला तक पहुंचने की चुनौती अलग-अलग स्तर पर महसूस की जाती है। हालांकि वास्तविक यात्रा समय संबंधित गांव, सड़क संपर्क और परिवहन सुविधा के अनुसार बदलता है, फिर भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था स्थानीय जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त रूप से सुविधाजनक है? नूरपुर के पक्ष में एक महत्वपूर्ण आधार पुलिस जिला व्यवस्था भी है। वर्ष 2022 में नूरपुर पुलिस जिला स्थापित होने से क्षेत्र में पुलिस प्रशासन की अलग पहचान और स्थानीय स्तर पर कानून-व्यवस्था के प्रबंधन को संस्थागत आधार मिला। लेकिन पुलिस जिला और पूर्ण राजस्व जिला दो अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। पुलिस जिले के अंतर्गत पुलिस अधीक्षक कार्यालय और संबंधित पुलिस प्रशासनिक ढांचा आता है, जबकि राजस्व जिले के लिए उपायुक्त कार्यालय, राजस्व प्रशासन, विभिन्न विभागों का जिला स्तरीय समन्वय और अन्य आवश्यक संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित करनी पड़ती हैं। इसलिए पुलिस जिला बन जाना नूरपुर के दावे को चर्चा में जरूर रखता है, मगर इसे पूर्ण जिला गठन का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। नूरपुर की भौगोलिक स्थिति, सीमावर्ती क्षेत्रों से संपर्क, फतेहपुर और इंदौरा की प्रशासनिक आवश्यकताएं, सरकारी कार्यालयों की उपलब्धता, जनसंख्या, संभावित जिला मुख्यालय तक पहुंच और नए कार्यालयों के लिए भूमि की उपलब्धता जैसे पहलुओं का निष्पक्ष अध्ययन होना चाहिए। यदि आयोग इन तथ्यों के आधार पर सिफारिश करता है, तो नूरपुर की मांग को भावनात्मक आग्रह के बजाय प्रशासनिक तर्कों के साथ प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। पूर्व मंत्री राकेश पठानिया के कार्यकाल में क्षेत्र में विकसित हुई प्रशासनिक एवं अन्य संस्थागत सुविधाओं को भी दस्तावेजों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मूल्यांकन में शामिल किया जा सकता है।
देहरा और रामपुर की मांग, हिमाचल के पहाड़ी भूगोल में विकेंद्रीकरण क्यों जरूरी? नए जिलों की चर्चा केवल नूरपुर तक सीमित नहीं है। देहरा और रामपुर भी अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, क्षेत्रीय जरूरतों और प्रशासनिक पहुंच के आधार पर जिला गठन की मांग के प्रमुख दावेदारों में गिने जाते रहे हैं। देहरा के लिए जिला बनने का प्रश्न विशेष रूप से कांगड़ा जिले के विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र और विभिन्न उपमंडलों की प्रशासनिक सुविधाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, शिमला जिले के रामपुर क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, दूरस्थ ग्रामीण इलाकों से संपर्क और पहाड़ी रास्तों की चुनौतियां प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की आवश्यकता पर ध्यान आकर्षित करती हैं। प्रदेश में सुंदरनगर, सरकाघाट, धर्मपुर और पालमपुर जैसे क्षेत्रों में भी समय-समय पर जिला बनाने की मांग उठती रही है। लेकिन किसी क्षेत्र में मांग उठना और उसका जिला बनने के योग्य पाया जाना दो अलग-अलग बातें हैं। आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह सभी दावेदार क्षेत्रों के साथ समान व्यवहार करे और किसी एक क्षेत्र को राजनीतिक प्रभाव, जनभावना के दबाव या चुनावी समीकरण के आधार पर प्राथमिकता देने के बजाय समान मानकों पर मूल्यांकन करे। हिमाचल में वर्तमान में 12 राजस्व जिले हैं। वर्ष 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद से अब तक नए राजस्व जिले का गठन नहीं हुआ है। इतने लंबे समय में आबादी, सड़क नेटवर्क, शहरीकरण, आर्थिक गतिविधियों और सरकारी सेवाओं की जरूरतों में बदलाव आया है। ऐसे में प्रशासनिक सीमाओं की समीक्षा एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हालांकि नए जिले बनाने के साथ खर्च, अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्धता, सरकारी भवनों, न्यायिक एवं राजस्व सेवाओं तथा वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी। केवल नया जिला घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा; वहां नागरिकों को वास्तविक सुविधाएं मिलना भी उतना ही जरूरी है।
आयोग की छह महीने की समयसीमा और राजनीतिक सवाल, क्या फैसला चुनाव से पहले होगा? नए जिलों के गठन के लिए आयोग को छह महीने में रिपोर्ट देने का समय दिए जाने की बात ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है। विपक्ष इसे सरकार की राजनीतिक रणनीति के रूप में देख सकता है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष इसे लंबे समय से उठ रही मांगों के अध्ययन की पहल के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन लोकतंत्र में किसी निर्णय की उपयोगिता का आकलन उसके समय से अधिक उसकी प्रक्रिया, पारदर्शिता और परिणामों से होना चाहिए। यदि आयोग निर्धारित समय में ठोस रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो सरकार के सामने सिफारिशों पर विचार करने का आधार उपलब्ध होगा। हालांकि रिपोर्ट आने और जिला गठन की अंतिम अधिसूचना जारी होने के बीच कई प्रशासनिक, वित्तीय और कानूनी प्रक्रियाएं हो सकती हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि विधानसभा चुनाव से पहले नए जिलों का गठन निश्चित रूप से हो जाएगा। राजनीतिक दृष्टि से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की इस पहल का कांगड़ा जिले की राजनीति से कोई विशेष संबंध है? क्या मुख्यमंत्री भविष्य में कांगड़ा से चुनाव लड़ने की संभावना को ध्यान में रखकर यह कदम उठा रहे हैं? फिलहाल ऐसे सवालों को राजनीतिक अटकलों की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए। किसी निर्णय के पीछे किसी नेता की चुनावी मंशा होने का निष्कर्ष निकालने के लिए ठोस प्रमाण और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्य आवश्यक हैं। इसी तरह यह दावा करना भी उचित नहीं होगा कि नए जिलों का मुद्दा किसी एक पार्टी का था और दूसरी पार्टी ने उसे पूरी तरह अपने पक्ष में कर लिया है। वर्ष 2002 के आसपास तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में नए जिलों की संभावनाओं पर चर्चा होने के बावजूद प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया था। इसके बाद भी अलग-अलग समय पर यह मुद्दा राजनीतिक बहस में आता रहा। अब आयोग के गठन से इस पुराने प्रश्न को संस्थागत तरीके से परखने का अवसर मिला है। सरकार और विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी है कि वे जनता की उम्मीदों को केवल चुनावी भाषणों तक सीमित न रखें।
जनहित की कसौटी पर हो अंतिम निर्णय, जिला मुख्यालय जनता के करीब आएं हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन पर अंतिम फैसला लेते समय सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह होनी चाहिए कि इससे आम नागरिक को कितना लाभ मिलेगा। आयोग को प्रत्येक प्रस्तावित क्षेत्र की जनसंख्या, भौगोलिक विस्तार, जिला मुख्यालय से औसत दूरी, यात्रा में लगने वाला समय, सड़क संपर्क, स्वास्थ्य एवं शिक्षा संस्थानों, राजस्व कार्यालयों, पुलिस व्यवस्था, न्यायिक सुविधाओं, सरकारी भवनों और वित्तीय व्यवहार्यता का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए। इसके साथ स्थानीय निकायों, पंचायत प्रतिनिधियों, व्यापारिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और आम नागरिकों की राय भी दर्ज की जानी चाहिए। यह भी देखना होगा कि नए जिले बनने से विकास योजनाओं की निगरानी, आपदा प्रबंधन, भूमि संबंधी मामलों, प्रमाणपत्रों, पेंशन, राजस्व विवादों और अन्य सरकारी सेवाओं के निस्तारण में कितनी तेजी आ सकती है। दूसरी ओर, नए प्रशासनिक ढांचे पर होने वाले अतिरिक्त खर्च और कर्मचारियों की जरूरतों का यथार्थ आकलन भी अनिवार्य है, ताकि जनहित में लिया गया निर्णय राज्य के वित्तीय संसाधनों पर अनियंत्रित बोझ न बने। नूरपुर, देहरा और रामपुर सहित अन्य क्षेत्रों की जनता को आयोग के समक्ष अपने पक्ष में तथ्यात्मक दस्तावेज, दूरी के आंकड़े, जनसंख्या संबंधी जानकारी और प्रशासनिक कठिनाइयों के प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। राजनीतिक दलों को भी इस मुद्दे पर क्षेत्रवाद या आरोप-प्रत्यारोप के बजाय एक साझा नीति विकसित करनी चाहिए। आखिरकार जिला केवल नक्शे पर खींची गई नई सीमा या किसी क्षेत्र को मिलने वाला नया नाम नहीं होता; वह प्रशासनिक जवाबदेही, विकास के विकेंद्रीकरण और नागरिकों की सुविधाओं का माध्यम होता है। यदि नए जिले बनते हैं, तो उनका उद्देश्य जनता को शासन के करीब लाना होना चाहिए। यदि आयोग किसी क्षेत्र को जिला बनाने की सिफारिश नहीं करता, तो उसके कारण भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए। हिमाचल की जनता को चुनावी वादों से अधिक स्पष्ट नीति, समयबद्ध कार्रवाई और जवाबदेह शासन की आवश्यकता है। नूरपुर की उम्मीद, देहरा की मांग और रामपुर की आकांक्षा का वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब अंतिम निर्णय राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर भूगोल, प्रशासनिक जरूरत और जनहित के ठोस आधार पर लिया जाएगा।

