भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और वह विभिन्न स्रोतों से कच्चा तेल खरीदता है।

टैरिफ की तलवार और बदलती वैश्विक व्यवस्था
अमेरिका द्वारा रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की व्यवस्था से जुड़ा लिंडसे ओ. ग्राहम प्रतिबंध विधेयक वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत-अमेरिका संबंधों के लिए गंभीर महत्व रखता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को इस विधेयक को 262-159 मतों से पारित किया है। इसमें राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा खरीदार इसके संभावित दायरे में आते हैं।
इसे केवल आयात शुल्क बढ़ाने का मामला मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह रूस-यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा आर्थिक साधनों के जरिए रूस पर दबाव बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। लेकिन इसका असर केवल रूस तक सीमित नहीं रह सकता। यदि भारत जैसे बड़े देश पर भी ऐसा शुल्क लगाया जाता है तो उसका प्रभाव द्विपक्षीय व्यापार, ऊर्जा बाजार, निवेश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं तक पहुंच सकता है।
भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और वह विभिन्न स्रोतों से कच्चा तेल खरीदता है। भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार वार्ता पहले से चल रही है, ऐसे में नया टैरिफ अधिकार दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को और जटिल बना सकता है।
भारत के निर्यात और रोजगार के सामने चुनौती
अमेरिकी बाजार भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत के प्रमुख अमेरिकी निर्यातों में इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग सामान, दवाइयां, रत्न एवं आभूषण तथा कपड़ा शामिल हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2024 में अमेरिका को भारत का माल निर्यात लगभग 86.35 अरब डॉलर था। नीति आयोग के व्यापार विश्लेषण के अनुसार अमेरिकी बाजार भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, परिधान, वस्त्र और रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
ऐसे में यदि भारत से आने वाले उत्पादों पर अत्यधिक शुल्क लगाया जाता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय माल महंगा हो सकता है। इसका बोझ केवल भारतीय निर्यातकों पर नहीं पड़ेगा; अमेरिकी आयातकों और उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त लागत का असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक नुकसान कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शुल्क किन उत्पादों पर, कितनी अवधि के लिए और किस दर से लगाया जाता है। फिलहाल इस प्रभाव का कोई निश्चित आर्थिक आंकड़ा देना जल्दबाजी होगी।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता रोजगार वाली अर्थव्यवस्था की है। कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण, छोटे उद्योग और कुछ विनिर्माण क्षेत्र बड़े निर्यात बाजारों पर निर्भर हैं। यदि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता घटती है तो कंपनियों के सामने उत्पादन, निवेश और रोजगार को लेकर कठिन फैसले आ सकते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा से समझौता कितना उचित?
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और कीमत दोनों निर्णायक हैं। भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में है और रूस हाल के वर्षों में उसके महत्वपूर्ण कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। उद्योग जगत का कहना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में रूसी कच्चे तेल को अचानक बड़े पैमाने पर दूसरे स्रोतों से बदलना आसान नहीं होगा।
यहीं भारत के सामने सबसे कठिन संतुलन है—एक ओर अमेरिका के साथ व्यापारिक और रणनीतिक संबंध, दूसरी ओर देश की ऊर्जा आवश्यकता। यदि सस्ता या प्रतिस्पर्धी तेल उपलब्ध नहीं रहता और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका असर परिवहन, उत्पादन और अंततः आम उपभोक्ता की जेब तक पहुंच सकता है।
इसलिए भारत की नीति भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर आधारित होनी चाहिए। अमेरिका से संवाद का रास्ता खुला रहना चाहिए और जहां संभव हो, शुल्क से छूट, कोटा या अन्य व्यावहारिक व्यवस्थाओं पर बातचीत की जानी चाहिए।
दबाब की राजनीति -*आत्मनिर्भरता से भारत के सामने सबसे प्रभावी रास्ता किसी एक देश के खिलाफ आर्थिक टकराव बढ़ाना नहीं, बल्कि अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है। अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखते हुए यूरोप, अफ्रीका, पश्चिम एशिया, लैटिन अमेरिका और आसियान देशों में निर्यात के नए अवसर तलाशने होंगे। मुक्त व्यापार समझौतों और बाजार विविधीकरण की प्रक्रिया को गति देना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
सरकार को ऐसे निर्यात क्षेत्रों की मदद करनी होगी जिन पर अमेरिकी बाजार में संभावित शुल्क का अधिक असर पड़ सकता है। एमएसएमई को सस्ता ऋण, तकनीकी सहायता, निर्यात बीमा और नए बाजारों तक पहुंच उपलब्ध कराना जरूरी होगा। साथ ही घरेलू विनिर्माण को इतना प्रतिस्पर्धी बनाना होगा कि वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पाद केवल शुल्क रियायतों के भरोसे न रहें।
रूस, खाड़ी देशों और अन्य साझेदारों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की संभावनाओं पर भी काम किया जा सकता है, लेकिन इसे तत्काल ‘डॉलर से मुक्ति’ का समाधान मानना व्यावहारिक नहीं होगा। डॉलर वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अभी भी केंद्रीय भूमिका निभाता है।
अंततः भारत को इस पूरे घटनाक्रम को केवल अमेरिका बनाम रूस के विवाद के रूप में नहीं, बल्कि बदलती विश्व आर्थिक व्यवस्था के संकेत के रूप में देखना चाहिए। अमेरिका के साथ मजबूत संबंध भारत के हित में हैं, लेकिन मजबूत संबंधों का अर्थ आर्थिक विकल्पों का समाप्त हो जाना नहीं है। भारत की विदेश नीति का आधार संवाद, विविधीकरण और रणनीतिक स्वायत्तता होना चाहिए।
आज आवश्यकता किसी जल्दबाजी में लिए गए प्रतिशोधात्मक निर्णय की नहीं, बल्कि ऐसी दीर्घकालिक नीति की है जिसमें ऊर्जा सुरक्षा भी बनी रहे, निर्यात भी सुरक्षित रहें और भारत की आर्थिक निर्णय लेने की क्षमता भी मजबूत हो। यही संतुलन आने वाले समय में भारत की आर्थिक शक्ति और विदेश नीति की वास्तविक परीक्षा होगा।

