अलग-अलग जुलूसों में दिखी नेताओं की ताकत, टिकट की दौड़ से जोड़कर देखी जा रही सियासी कवायद
संसदीय क्षेत्र कांगड़ा-चंबा | चीफ ब्यूरो — विनय महाजन | दिनांक: 04-09- 2026
नूरपुर:प्रदेश स्तरीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के बीच नूरपुर की सियासत में भी गर्माहट देखने को मिली। धार्मिक आयोजन के अवसर पर भाजपा के अलग-अलग नेताओं के समर्थकों द्वारा किए गए शक्ति प्रदर्शन को अब राजनीतिक गलियारों में भाजपा के लिए चुनौती और कांग्रेस के लिए संभावित संजीवनी के रूप में देखा जा रहा है।जन्माष्टमी महोत्सव के पहले दिन भाजपा विधायक रणवीर सिंह निक्का, कांगड़ा-चंबा लोकसभा सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज और पूर्व मंत्री राकेश पठानिया अलग-अलग समर्थक समूहों के साथ श्री बृजराज स्वामी मंदिर पहुंचे। नियाजपुर क्षेत्र में विधायक रणवीर सिंह निक्का और सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज के समर्थकों ने स्वागत किया। इसके बाद समर्थकों के साथ जुलूस मंदिर पहुंचा और भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन किए गए।
वहीं, पूर्व मंत्री राकेश पठानिया भी अपने समर्थकों के बड़े समूह के साथ मंदिर पहुंचे। उनके समर्थकों ने जुलूस के दौरान नारेबाजी करते हुए अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। जुलूस में महिलाओं की भी उल्लेखनीय भागीदारी दिखाई दी।धार्मिक आयोजन के बीच भाजपा नेताओं के अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन ने क्षेत्र में नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी है। सियासी जानकार इसे केवल धार्मिक कार्यक्रम में भागीदारी न मानकर आने वाले विधानसभा चुनावों की संभावित तैयारियों और संगठन के भीतर प्रभाव की परीक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, नेताओं के समर्थकों की ओर से इसे धार्मिक आस्था और जनभागीदारी का हिस्सा बताया जा सकता है।
क्या टिकट की दौड़ ने बढ़ाई दूरी?
नूरपुर में लंबे समय से भाजपा के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में जन्माष्टमी जैसे बड़े सार्वजनिक मंच पर अलग-अलग नेताओं के समर्थकों की भीड़ को कुछ लोगआगामी चुनाव में टिकट की संभावित दावेदारी और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई से जोड़कर देख रहे हैं।समर्थकों ने अपने-अपने नेताओं के पक्ष में भीड़ जुटाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि क्षेत्र में किस नेता का जनाधार कितना मजबूत है। यही वजह है कि जन्माष्टमी का धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे नूरपुर की सियासी चर्चा का केंद्र बन गया।
श्रद्धालुओं को हुई परेशानी पर भी उठे सवाल
दूसरी ओर, कुछ सामाजिक संस्थाओं और श्रद्धालुओं ने बड़े राजनीतिक जुलूसों के कारण मंदिर में दर्शन व्यवस्था प्रभावित होने पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी थीं और भीड़ इतनी अधिक थी कि कई लोगों को बिना दर्शन लौटना पड़ा। ऐसे में राजनीतिक दलों और नेताओं को धार्मिक आयोजनों में आम श्रद्धालुओं की सुविधा का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।
मेले की सफलता में पुराने योगदान की भी चर्चा
नूरपुर के इस प्रदेश स्तरीय जन्माष्टमी महोत्सव को लेकर स्थानीय स्तर पर स्वर्गीय आरके महाजन परिवार के योगदान की भी चर्चा होती रही है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि जिस आयोजन की नींव वर्षों पहले रखी गई थी, वह आज प्रदेश स्तर का स्वरूप ले चुका है। ऐसे में इसकी सफलता का श्रेय किसी एक राजनीतिक दल के बजाय आयोजन से जुड़े सभी लोगों और स्थानीय समाज के सामूहिक प्रयासों को दिया जाना चाहिए।
भाजपा के लिए आत्मघाती या कांग्रेस के लिए संजीवनी?
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि यदि भाजपा के नेता और उनके समर्थक सार्वजनिक मंचों पर अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन करते हैं, तो इसका संदेश संगठन के पक्ष में जाता है या अंदरूनी खींचतान की ओर संकेत करता है?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसी तस्वीरें लगातार सामने आती रहीं तो आगामी विधानसभा चुनाव के समय भाजपा के लिए यह राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित हो सकता है। वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की कथित अंदरूनी असहमति को मुद्दा बनाकर अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकती है।
हालांकि, एक धार्मिक आयोजन में नेताओं की अलग-अलग मौजूदगी को सीधे गुटबाजी या टिकट की लड़ाई का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि नूरपुर में एक ही पार्टी से जुड़े नेताओं के अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन ने सियासी चर्चाओं को हवा दे दी है।अब निगाहें इस बात पर हैं कि आने वाले दिनों में भाजपा का स्थानीय संगठन इन अलग-अलग राजनीतिक धाराओं को किस तरह एक मंच पर लाता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में भीड़ से ज्यादा महत्वपूर्ण संगठन की एकजुटता होती है, और नूरपुर में आज का दृश्य इसी सवाल को सबसे ज्यादा चर्चा में ले आया है।

