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देवभूमि हिमाचल में फिर लौटी लंपी बीमारी, सिरमौर के बाद नालागढ़ और कुनिहार में सामने आए मामले

RamParkash Vats
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पशुपालन विभाग ने वेक्सिनेशन को लेकर कार्य किया शुरू

देवभूमि हिमाचल में फिर से दूध उत्पादकों के लिए चिंता का कारण बन चुका है क्योंकि गाय और भैंसे में होने वाले लंपी वायरस बीमारी ने फिर से हिमाचल प्रदेश में दस्तक दे दी है। जिला सिरमौर के कुछ जगह पर मामले सामने आने के बाद सोलन में भी सीमावर्ती एरिया जो कि पंजाब और हरियाणा के साथ हिमाचल प्रदेश का लगता है वहां पर पशुपालन विभाग ने अलर्ट मा जारी किया था क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़ से सीमावर्ती राज्यों में पशुओं का आना जाना लगा रहता है। ऐसे में इस बीमारी के फैलने का डर था।

बाइट – डॉ विवेक लांबा, उपनिदेशक पशुपालन विभाग सोलन

इसी के चलते जिला सोलन के नालागढ़ की कुछ गौशालाओं और कुनिहार में 30 मामले लंपी वायरस के सामने आए हैं। इसके बाद पशुपालन विभाग अलर्ट मोड पर आ गया है। पशुपालन विभाग सोलन के उपनिदेशक डॉ. विवेक लांबा ने बताया कि पशुपालन विभाग ने पहले ही लंपी वायरस की बीमारी को देखते हुए अलर्ट मोड पर आकर कार्य करना शुरू कर दिया था और इसके लिए 90500 वैक्सीनेशन की डोज मंगाई गई थी।

उन्होंने कहा कि चार से पांच साल पहले घातक रूप से हिमाचल प्रदेश में यह बीमारी फैली थी लेकिन उस समय लगी वैक्सीनेशन की वजह से अभी तक कम ही पशु उसकी चपेट में आए हैं। उन्होंने कहा कि जिला में सभी पशुओं का वैक्सीनेशन किया जा रहा है इसकी डेली रिपोर्टिंग भी की जा रही है और सरकार तक पहुंचाई भी जा रही है।

उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में भी लंपी वायरस की बीमारी से पशु ग्रसित हो रहे हैं उन्हें तुरंत वैक्सीनेशन करवाने और पशुओं को आइसोलेट करने के निर्देश भी दिए जा रहे हैं इसके लिए टीमों का गठन भी किया गया है।

उन्होंने बताया कि लंपी वायरस मवेशियों, विशेषकर गायों और भैंसों में कैप्रीपॉक्स वायरस से फैलने वाला एक संक्रामक वायरल रोग है। यह बीमारी मुख्य रूप से मच्छरों, मक्खियों और टिक्स जैसे खून चूसने वाले कीड़ों के माध्यम से फैलती है, जिससे पशुओं के शरीर पर गांठें, तेज बुखार और दूध उत्पादन में भारी कमी आती है।

उन्होंने बताया कि इसके मुख्य लक्षण शरीर, सिर, गर्दन और थनों पर 2 से 5 सेंटीमीटर आकार की कठोर गांठें (नोड्यूल) बनना, तेज बुखार और आंखों व नाक से पानी बहनापशु का सुस्त होना और खाना कम करना और दूध उत्पादन में अचानक भारी गिरावट होना है।

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