सोचने वाली बात यह है कि जब युवा वर्ग तक इन दिनों की गर्मी को सहन करने में कठिनाई महसूस करता है, तो आखिर छोटे बच्चों पर क्या गुजरती होगी? सुबह भारी स्कूल बैग के साथ निकलना, घंटों कक्षाओं में बैठना और तपती धूप में घर लौटना—क्या यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के अनुकूल है?

न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
पहाड़ों की ठंडी फिजाओं और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हिमाचल प्रदेश आज एक ऐसे प्रश्न के सामने खड़ा है, जिसे केवल शिक्षा व्यवस्था का मसला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह प्रश्न है—क्या हमारे बच्चों का स्वास्थ्य, सुविधा और मानसिक संतुलन स्कूलों की मनमर्जी से कम महत्वपूर्ण हो गया है? पूर्व विधायक नीरज भारती द्वारा उठाया गया यह मुद्दा न केवल काबिले तारीफ है, बल्कि एक ऐसी वास्तविक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जिससे हजारों परिवार प्रतिदिन जूझ रहे हैं।
वास्तव में यह समस्या सबसे अधिक उन मासूम बच्चों को प्रभावित करती है, जो अभी प्राथमिक स्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 10 से 12 वर्ष तक के बच्चों का शरीर अत्यधिक गर्मी को सहने में सक्षम नहीं होता। ऐसे में ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरें और विशेषकर “मृगस्नाह” के वे 16 दिन, जिन्हें पारंपरिक रूप से वर्ष का सबसे अधिक गर्म समय माना जाता है, बच्चों के स्वास्थ्य के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होते।
सोचने वाली बात यह है कि जब युवा वर्ग तक इन दिनों की गर्मी को सहन करने में कठिनाई महसूस करता है, तो आखिर छोटे बच्चों पर क्या गुजरती होगी? सुबह भारी स्कूल बैग के साथ निकलना, घंटों कक्षाओं में बैठना और तपती धूप में घर लौटना—क्या यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के अनुकूल है? शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का समग्र विकास होना चाहिए, न कि उन्हें ऐसी परिस्थितियों में धकेलना, जो उनके स्वास्थ्य के लिए संकट का कारण बन जाएं।
यहीं पर नीरज भारती की चिंता पूरी तरह न्यायसंगत प्रतीत होती है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच फेसबुक पर हिमाचल प्रदेश सरकार और विशेष रूप से शिमला के निजी विद्यालयों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए जो बात कही है, वह लाखों अभिभावकों की आवाज बन चुकी है। सवाल बिल्कुल सीधा है—यदि मौसम, क्षेत्र और परिस्थितियां समान हैं, तो आखिर स्कूलों की छुट्टियों का शेड्यूल अलग-अलग क्यों?
यह किसी एक विद्यालय की बात नहीं, बल्कि एक व्यापक अव्यवस्था का संकेत है। कोई स्कूल गर्मियों की छुट्टियां पहले घोषित कर देता है, तो कोई बाद में। कहीं केवल एक सप्ताह का अवकाश दिया जाता है, तो कहीं उसका समय भी अस्पष्ट रहता है। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बच्चों और उनके अभिभावकों पर पड़ता है। विशेषकर वे परिवार, जिनके बच्चे अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं, सबसे अधिक परेशानी झेलते हैं। एक बच्चे की छुट्टियां शुरू हो जाती हैं, जबकि दूसरे का स्कूल नियमित चलता रहता है। ऐसे में परिवार न तो कहीं घूमने की योजना बना पाते हैं, न रिश्तेदारी निभा पाते हैं और न ही बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिता पाते हैं।
विडंबना यह भी है कि अचानक छुट्टियों की सूचना देने की प्रवृत्ति अब सामान्य होती जा रही है। यदि किसी शनिवार को अवकाश घोषित करना हो, तो शुक्रवार शाम को संदेश भेज दिया जाता है कि अगले दिन स्कूल बंद रहेगा। प्रश्न यह उठता है कि क्या अभिभावक मशीन हैं? क्या उनके अपने कार्य, कार्यालय, यात्राएं और योजनाएं कोई मायने नहीं रखतीं? एक घंटे में पूरी पारिवारिक व्यवस्था बदलना क्या व्यवहारिक है?
यह मानना पड़ेगा कि निजी विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ एक जिम्मेदारी भी निभाते हैं। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम पूरा करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी हिस्सा है। स्कूलों को यह समझना होगा कि वे केवल संस्थान नहीं, बल्कि परिवारों की दिनचर्या का एक अहम हिस्सा हैं। इसलिए अवकाश नीति केवल स्कूल प्रबंधन की सुविधा के आधार पर तय नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें बच्चों और अभिभावकों की सहूलियत को भी समान महत्व मिलना चाहिए।
सरकार को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रदेश में एक समान ग्रीष्मकालीन अवकाश नीति बनाना समय की मांग बन चुकी है। कम से कम एक ऐसा साझा शेड्यूल तय हो, जिससे भ्रम और असुविधा समाप्त हो सके। साथ ही यदि किसी कारणवश अतिरिक्त अवकाश देना आवश्यक हो, तो उसकी सूचना समय रहते अभिभावकों तक पहुंचनी चाहिए, ताकि वे अपने कार्यों और बच्चों के कार्यक्रमों की बेहतर योजना बना सकें।
बच्चों का बचपन, उनका स्वास्थ्य और उनका मानसिक संतुलन किसी भी प्रशासनिक अव्यवस्था से बड़ा विषय है। यदि हम सचमुच एक स्वस्थ और संवेदनशील समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो शिक्षा व्यवस्था को बच्चों की जरूरतों के अनुरूप बनाना होगा। क्योंकि आखिरकार, विद्यालयों का उद्देश्य केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित और संतुलित बनाना भी है।

