SHIMLA ,न्यूज इंडिया आजतक,राज्य चीफ ब्यूरो विजय समयाल
नगर परिषद देहरा का चुनाव इस बार केवल वार्डों की जीत-हार तक सीमित नहीं रह गया है। यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के भीतर उभर रहे शक्ति-संतुलन, नेतृत्व संघर्ष और संगठनात्मक असमंजस का खुला राजनीतिक मंच बन चुका है। प्रदेशभर में भाजपा जहां निकाय चुनावों में संगठित रणनीति के साथ उतरती दिखाई दी, वहीं देहरा में आधिकारिक उम्मीदवारों की सूची तक जारी न हो पाना यह संकेत देता है कि पार्टी का स्थानीय ढांचा गंभीर अंतर्विरोधों से गुजर रहा है।
देहरा की राजनीति लंबे समय से व्यक्तित्व आधारित रही है। यहां संगठन से अधिक प्रभाव स्थानीय नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ और समर्थक समूहों का रहा है। पूर्व विधायक होशियार सिंह के भाजपा में आने के बाद यह टकराव और तीखा हो गया। भाजपा के पारंपरिक कार्यकर्ताओं और नए शक्ति केंद्र के बीच जो दूरी पहले भीतर ही भीतर थी, वह अब खुलकर “असली और नकली बीजेपी” की बहस में बदलती दिखाई दे रही है। यह केवल नाराजगी नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वामित्व की लड़ाई है।
पूर्व मंत्री रमेश धवाला पहले ही पार्टी नेतृत्व के खिलाफ असहमति जता चुके हैं। ऐसे में देहरा भाजपा के भीतर कई समानांतर शक्ति केंद्र सक्रिय हो गए हैं। यही कारण है कि एक वार्ड के उम्मीदवार को लेकर शुरू हुआ विवाद पूरी सूची पर भारी पड़ गया। यह स्थिति बताती है कि भाजपा फिलहाल स्थानीय स्तर पर सामूहिक नेतृत्व की बजाय गुटीय राजनीति में उलझी हुई है।
राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा जिस देहरा सीट को भविष्य की रणनीतिक लड़ाई मानती है, वहीं पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट दिशा देने में असफल दिखाई दे रही है। कांग्रेस विधायक Kamlesh Thakur की मौजूदगी और मुख्यमंत्री Sukhvinder Singh Sukhu से उनका सीधा राजनीतिक संबंध पहले ही इस क्षेत्र को सत्ता का केंद्र बना चुका है। ऐसे में भाजपा की आंतरिक खींचतान कांग्रेस के लिए अप्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ का अवसर बन सकती है।
देहरा में भाजपा की मौजूदा स्थिति यह भी दर्शाती है कि पार्टी अब केवल वैचारिक संगठन नहीं, बल्कि स्थानीय प्रभावशाली चेहरों के संतुलन पर निर्भर होती जा रही है। यही कारण है कि आधिकारिक घोषणा न होने के बावजूद उम्मीदवार मैदान में हैं और हर गुट खुद को “वास्तविक भाजपा” साबित करने में जुटा है। यह स्थिति कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों में भ्रम पैदा कर रही है।
पूर्व विधायक होशियार सिंह द्वारा अपने समर्थित उम्मीदवार को “असली भाजपा प्रत्याशी” के रूप में प्रस्तुत करना और समानांतर राजनीतिक संपर्क साधना यह संकेत देता है कि स्थानीय चुनाव अब संगठनात्मक अनुशासन से अधिक व्यक्तिगत राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। दूसरी ओर कांग्रेस की “वेट एंड वॉच” रणनीति भी कम दिलचस्प नहीं है। विधायक कमलेश ठाकुर फिलहाल प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से बचती दिख रही हैं, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि भाजपा की टूट कांग्रेस के लिए भविष्य में समीकरण साधने का अवसर बन सकती है।
निकाय चुनाव सामान्यतः स्थानीय विकास, सफाई, सड़क और नागरिक सुविधाओं के मुद्दों पर लड़े जाते हैं, लेकिन देहरा में यह चुनाव राजनीतिक निष्ठाओं और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गया है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब केवल सीट जीतना नहीं, बल्कि संगठनात्मक विश्वसनीयता बचाना भी है।
यदि चुनाव परिणामों में भाजपा समर्थित बागी उम्मीदवार बेहतर प्रदर्शन करते हैं, तो यह पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा संदेश होगा कि स्थानीय राजनीति में व्यक्तिगत प्रभाव अब संगठन से बड़ा होता जा रहा है। वहीं यदि आधिकारिक लाइन से हटकर बने समीकरण सफल होते हैं, तो आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले देहरा भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन और नए राजनीतिक ध्रुवीकरण की शुरुआत भी देखी जा सकती है।
देहरा नगर परिषद का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां वार्डों की लड़ाई के पीछे भविष्य की विधानसभा राजनीति की छाया साफ दिखाई दे रही है। भाजपा के भीतर चल रही यह जंग फिलहाल केवल उम्मीदवार चयन का विवाद नहीं, बल्कि यह तय करने की लड़ाई बन चुकी है कि देहरा में पार्टी का वास्तविक चेहरा कौन होगा।

