जिस मनुष्य को प्रकृति ने सबसे बुद्धिमान बनाया, वही आज इस धरती के संतुलन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

पूरे ब्रह्मांड की अब तक की ज्ञात दुनिया में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहां जीवन संभव है। इसका कारण केवल मिट्टी, पर्वत और समुद्र नहीं, बल्कि वे सूक्ष्म और संतुलित प्राकृतिक तत्व हैं, जिन्होंने करोड़ों वर्षों में जीवन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है। जल, वायु, तापमान, गुरुत्वाकर्षण और जैव विविधता जैसे सुरक्षा तत्व पृथ्वी के अस्तित्व की वह नींव हैं, जिन पर मानव सभ्यता खड़ी है। दुखद यह है कि जिस मनुष्य को प्रकृति ने सबसे बुद्धिमान बनाया, वही आज इस धरती के संतुलन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।पृथ्वी का निर्माण किसी एक दिन में नहीं हुआ। प्रकृति ने लाखों-करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया से इस ग्रह को जीवन योग्य बनाया। पहाड़ बने, नदियां बहने लगीं, वन उगे, मौसम का चक्र बना और तब जाकर जीवन की संभावना जन्मी। लेकिन मानव ने कुछ ही शताब्दियों में उस संतुलन को डगमगा दिया, जिसे प्रकृति ने अनगिनत युगों में सहेजा था।
विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने धरती के संसाधनों का उपयोग नहीं, बल्कि अंधाधुंध दोहन किया। जंगलों की कटाई, नदियों का प्रदूषण, वायु में जहर, और धरती के सीने से खनिजों का अत्यधिक दोहन—इन सबने पृथ्वी के सुरक्षा कवच को कमजोर कर दिया है। परिणाम आज हमारे सामने है। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है। बढ़ता तापमान, पिघलते हिमनद, असमय वर्षा और प्राकृतिक आपदाएं इस बात का संकेत हैं कि पृथ्वी अब चेतावनी दे रही है।चिंता केवल पर्यावरणीय संकट तक सीमित नहीं है। विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र अपनी राजनीतिक और सामरिक महत्वाकांक्षाओं में इतने उलझ गए हैं कि उन्होंने पृथ्वी के अस्तित्व को भी दांव पर लगा दिया है। युद्ध, परमाणु हथियार और विनाशकारी शस्त्रों का भंडार इस सुंदर ग्रह को पलभर में उजाड़ सकता है। अमेरिका, रूस, चीन, इजरायल और अन्य देशों के बीच बढ़ते तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि मानव ने अपनी आक्रामक सोच नहीं बदली, तो पृथ्वी को नष्ट करने के लिए किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
विडंबना यह है कि मनुष्य जीवन को बेहतर बनाने के नाम पर उसी जीवन के आधार को समाप्त कर रहा है। विकास तब तक सार्थक नहीं हो सकता, जब तक वह प्रकृति के साथ संतुलन में न हो। यदि पृथ्वी के सुरक्षा तत्व—जल, वायु और हरियाली—नष्ट हो गए, तो तकनीक और समृद्धि भी मानव को बचा नहीं पाएगी।आज आवश्यकता केवल सरकारी नीतियों की नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना की है। हर नागरिक का दायित्व है कि वह अपने स्तर पर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे। पेड़ लगाना, जल बचाना, प्रदूषण कम करना और शांति का समर्थन करना केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा कर्तव्य है।
विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। यदि हमने अभी भी चेतना नहीं दिखाई, तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। और यदि पृथ्वी नहीं बचेगी, तो मानव सभ्यता का भविष्य भी नहीं बचेगा।अब समय आ गया है कि हम केवल विकास की नहीं, बल्कि संतुलित विकास की भाषा सीखें, क्योंकि पृथ्वी बचेगी तभी हमारा कल बचेगा।
(मूल लेखक डा़ अशोक कुमार सोमल)

