भारत के स्वतंत्र सैनानियो को कोटि -कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सामाजिक सुधारकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इन महान विभूतियों ने समाज को जातिवाद, छुआछूत और अज्ञानता से मुक्त करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया। ऐसे ही महान समाज सुधारकों में महात्मा ज्योतिबा फुले का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने शिक्षा, समानता और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर समाज में नई चेतना जगाई।

महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ। उनके पिता गोविंदराव और माता चिमनाबाई थे। वे माली समुदाय से संबंध रखते थे और उनका परिवार फूलों का व्यवसाय करता था। बचपन में ही उनकी माता का देहांत हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण सगुणाबाई ने किया। सामाजिक परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई, लेकिन बाद में उन्होंने स्कॉटिश मिशन स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। इस शिक्षा ने उनके विचारों को नई दिशा दी और उन्होंने समाज सुधार का संकल्प लिया।
एक घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया। जब वे अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में गए, तो वहां जाति के आधार पर उनका अपमान किया गया। इस घटना से उन्हें समाज में व्याप्त भेदभाव का गहरा अनुभव हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि वे जीवन भर जाति प्रथा और छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष करेंगे।
महात्मा फुले ने महिला शिक्षा को समाज सुधार का सबसे महत्वपूर्ण साधन माना। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया और उन्हें देश की पहली महिला शिक्षिका बनाया। 1848 में उन्होंने पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला।
उस समय समाज में इसका भारी विरोध हुआ, लेकिन उन्होंने अपने कार्य को जारी रखा। सावित्रीबाई फुले को स्कूल जाते समय लोगों के ताने और पत्थर तक सहने पड़े, फिर भी वे डटी रहीं।महात्मा फुले ने केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के लिए भी अनेक कार्य किए। उन्होंने विधवाओं के लिए “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” की स्थापना की, जहां अनाथ और असहाय महिलाओं को सहारा मिलता था। उन्होंने किसानों और मजदूरों की समस्याओं को भी उठाया और उनके अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की।
1873 में महात्मा फुले ने “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य समाज में समानता स्थापित करना, जातिवाद समाप्त करना और शोषित वर्ग को अधिकार दिलाना था। सत्यशोधक समाज ने समाज में नई जागरूकता पैदा की और लोगों को आत्मसम्मान के साथ जीने की प्रेरणा दी।महात्मा ज्योतिबा फुले के महान कार्यों को देखते हुए
1888 में उन्हें “महात्मा” की उपाधि दी गई। उन्होंने अपना पूरा जीवन दलितों, महिलाओं और किसानों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। 28 नवंबर 1890 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी समाज को प्रेरणा देते हैं।
महात्मा ज्योतिबा फुले का जीवन हमें सिखाता है कि शिक्षा, समानता और मानवता से ही समाज में सच्ची आज़ादी संभव है। उन्होंने समाज को एकता में बांधने और भेदभाव मिटाने का जो संदेश दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

