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धारावाहिक (58)भारत के स्वतंत्र सैनानी:गोवा मुक्ति संग्राम की वीरांगना सुधाताई जोशी: अदालत में जवाब, सत्याग्रह, गिरफ्तारी और त्याग से पुर्तगाली शासन को चुनौती देकर स्वतंत्रता की मशाल जलाए रखी

RamParkash Vats
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गोवा मुक्ति संग्राम की वीरांगना सुधाताई जोशी: अदालत में जवाब, सत्याग्रह, गिरफ्तारी और त्याग से पुर्तगाली शासन को चुनौती देकर स्वतंत्रता की मशाल जलाए रखी

भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन: न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथा केवल अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष तक सीमित नहीं थी, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में विदेशी शासन के खिलाफ जन-जन ने आवाज़ बुलंद की। गोवा की धरती पर भी पुर्तग़ाली साम्राज्यवाद के विरुद्ध ऐसा ही एक आंदोलन उठा, जिसमें अनेक वीरों ने अपने साहस, त्याग और बलिदान से इतिहास रच दिया। इन्हीं वीरांगनाओं में अग्रिम पंक्ति में खड़ी थीं सुधाताई जोशी, जिनका जीवन मातृभूमि के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है।

जब अदालत में उनसे पूछा गया कि वे गोवा का भारत में विलय क्यों चाहती हैं, तब उन्होंने निर्भीक स्वर में कहा— “ऐसा कुछ नहीं है कि गोवा को अब भारत का अंग बनाया जा रहा है… वह सदियों से भारत का अभिन्न अंग रहा है। अलगाव आपने पैदा किया है। एक बार आप इस भूमि से चले जाएँ, वह स्वतः ही भारत का हिस्सा बन जाएगा।” यह उत्तर केवल शब्द नहीं था, बल्कि गुलामी के विरुद्ध एक क्रांतिकारी घोषणा थी, जिसने उनके अदम्य साहस और अटूट देशभक्ति को उजागर कर दिया।

चार शताब्दियों तक पुर्तग़ाली शासन की बेड़ियों में जकड़े गोवा में स्वतंत्रता की लौ बुझी नहीं थी। अंततः 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन विजय ने गोवा को विदेशी शासन से मुक्त कराया, किंतु इस अंतिम विजय से पहले वर्षों तक जनांदोलन चलता रहा। इस आंदोलन में किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, महिलाओं और सामान्य नागरिकों ने कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। दमन, गिरफ्तारी और अत्याचार के बावजूद स्वतंत्रता की यह मशाल जलती रही।

14 जनवरी 1918 को गोवा के प्रियोल गांव में जन्मी सुधाताई जोशी को औपचारिक शिक्षा भले ही कम मिली, परंतु उनमें ज्ञान की प्यास और देशभक्ति की भावना प्रबल थी। विवाह के बाद वे पूना पहुँचीं, जहाँ उनके पति महादेव शास्त्री जोशी गोवा मुक्ति आंदोलन से जुड़े थे। जब सत्याग्रह आंदोलन तेज हुआ, तो सुधाताई ने स्वयं आगे बढ़कर नेतृत्व संभालने का निर्णय लिया। उन्होंने गुप्त रूप से गोवा में प्रवेश किया, जबकि पुर्तग़ाली सरकार ने उनकी सूचना देने वाले के लिए इनाम घोषित कर रखा था।

5 अप्रैल 1955 को महाप्सा में सभा को संबोधित करते समय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने अपने भाषण में पुर्तग़ाल को याद दिलाया कि वह स्वयं भी कभी गुलामी झेल चुका है, इसलिए उसे दूसरों को स्वतंत्रता से वंचित करने का अधिकार नहीं है। इस निर्भीक वक्तव्य के बाद उन पर मुकदमा चलाया गया और दो वर्ष के कारावास की सजा दी गई। जेल में कठिन परिस्थितियों और स्वास्थ्य बिगड़ने के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा।

देशभर में उनके समर्थन में आवाज़ उठी और मई 1959 में उन्हें रिहा किया गया। उनकी वीरता और साहस की उस समय पूरे देश में प्रशंसा हुई। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा गोवा को पुर्तग़ाली शासन से मुक्त कराने के संघर्ष को समर्पित कर दिया। वर्ष 1994 में उनका निधन हुआ, पर उनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया।

सुधाताई जोशी उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थीं, जिन्होंने बिना प्रसिद्धि की चाह के मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल युद्ध से नहीं, बल्कि साहस, सत्याग्रह और अटूट विश्वास से भी प्राप्त होती है। उनके त्याग और बलिदान ने भारत की स्वतंत्रता की नींव को और मजबूत किया और आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति की अमूल्य प्रेरणा दी।

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