
भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि- कोटि नमन लेखिक संपादक राम प्रकाश बत्स
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस, त्याग और बलिदान की गौरवगाथा है, जिसका उद्देश्य भारत से ब्रिटिश शासन को समाप्त कर स्वराज स्थापित करना था। इस व्यापक आंदोलन में देश के हर वर्ग—किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएँ और बुद्धिजीवी—ने अपनी-अपनी भूमिका निभाते हुए तन-मन-धन से सहयोग दिया। एक ओर स्वतंत्रता सेनानी सत्याग्रह, असहयोग, आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से आज़ादी की लौ प्रज्वलित कर रहे थे, तो दूसरी ओर अंग्रेजी हुकूमत ने दमन, अत्याचार, गिरफ्तारी, लाठीचार्ज और गोलियों से इस जनांदोलन को कुचलने की भरपूर कोशिश की, किंतु इन सबके बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों का हौसला नहीं टूटा और उनके बलिदानों ने अंततः भारत को स्वतंत्रता दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया।

क्रांति की ज्वाला जब देश के कोने-कोने में धधक रही थी, तब हिमाचल की धरती से एक ऐसा निर्भीक युवक उठा, जिसने अपने संकल्प, साहस और विचारों से अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी—यह नाम था क्रांतिकारी यशपाल। हमीरपुर जिले की नादौन तहसील के भूंपल गाँव से संबंध रखने वाले यशपाल केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि विचारों के योद्धा और शब्दों के शिल्पी भी थे। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि स्वतंत्रता का संग्राम केवल बंदूक और बम से ही नहीं, बल्कि विचार और लेखनी से भी लड़ा जाता है। यशपाल ने अपने जीवन के प्रारंभिक दिनों से ही अन्याय और दासता के विरुद्ध विद्रोह का स्वर अपनाया और राष्ट्र की मुक्ति को अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाया।

यशपाल का जन्म फिरोजपुर में हुआ, किंतु उनकी जड़ों में हिमाचल की मिट्टी की सुगंध थी। यही मिट्टी उनके भीतर स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार करती रही। लाहौर के नेशनल कॉलेज में अध्ययन करते समय उनका संपर्क उन युवाओं से हुआ जो स्वतंत्रता की अग्नि में तप रहे थे। यही वह समय था जब यशपाल का व्यक्तित्व क्रांतिकारी दिशा में अग्रसर हुआ। वे भगत सिंह, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे महान क्रांतिकारियों के निकट आए और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़कर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। उनके भीतर का युवक अब क्रांति का सैनिक बन चुका था, जो देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर था।
क्रांतिकारी गतिविधियों में यशपाल का साहस अद्भुत था। उन्होंने अंग्रेजी शासन की जड़ों को हिलाने के लिए गुप्त रूप से संगठन को मजबूत किया, हथियारों की व्यवस्था की और बम निर्माण जैसे जोखिमपूर्ण कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई। वर्ष 1929 की वह ऐतिहासिक घटना उनके जीवन का साहसिक अध्याय बन गई, जब ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन की ट्रेन के नीचे बम रखने की योजना को उन्होंने अंजाम दिया। यह केवल एक विस्फोट नहीं था, बल्कि दासता के विरुद्ध भारतीय युवाओं की चेतावनी थी कि अब भारतवासी अन्याय को सहने वाले नहीं रहे। यद्यपि वायसराय उस घटना में बच गया, परंतु इस घटना ने अंग्रेजी शासन को हिला दिया और क्रांतिकारियों के मनोबल को नई ऊँचाई दी।
क्रांति का मार्ग आसान नहीं था। वर्ष 1932 में यशपाल गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें लंबी कारावास की सजा मिली। 1932 से 1938 तक जेल की सलाखों के भीतर बिताए वर्षों ने उनके संकल्प को और दृढ़ किया। कारागार की कठोरता ने उनके शरीर को भले ही बांधा, परंतु उनके विचारों को और अधिक तीक्ष्ण बना दिया। इसी दौरान उन्होंने लेखन आरंभ किया और अपने अनुभवों, संघर्षों तथा विचारों को शब्दों में ढालना शुरू किया। जेल की अंधेरी कोठरी में जन्मे ये विचार आगे चलकर समाज परिवर्तन की मशाल बने।
स्वतंत्रता के बाद यशपाल ने कलम को अपना हथियार बनाया। उन्होंने साहित्य के माध्यम से समाजवादी यथार्थवाद को नई दिशा दी। ‘झूठा-सच’, ‘दादा कामरेड’, ‘दिव्या’ और आत्मकथात्मक कृति ‘सिंहावलोकन’ जैसी रचनाओं ने उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान दिलाया। उनकी लेखनी में क्रांति की ज्वाला, समाज की पीड़ा और परिवर्तन का संदेश स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी रचना ‘मेरी तेरी उसकी बात’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जबकि राष्ट्र ने उनके योगदान को मान देते हुए उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया। यह सम्मान केवल एक साहित्यकार को नहीं, बल्कि उस क्रांतिकारी आत्मा को मिला जिसने जीवन भर स्वतंत्रता और समानता के आदर्शों को जिया।
क्रांतिकारी यशपाल का जीवन “बारूद से कलम” तक की यात्रा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने सिद्ध किया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक भी होनी चाहिए। वे उन सेनानियों में थे जिन्होंने संघर्ष की मशाल को हथियारों से जलाया और फिर उसे विचारों की लौ से प्रज्वलित रखा। आज भी उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना ही सच्ची देशभक्ति है। यशपाल का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसे ओजस्वी सेनानी के रूप में अंकित है, जिसने साहस, संघर्ष और साहित्य—तीनों से राष्ट्र को नई चेतना प्रदान की।

