न्यूज़ इंडिया आजतक चिंतन मंथन और विश्लेषण संपादक रराम प्रकाश बत्स
हिमाचल प्रदेश में चिट्टे (सिंथेटिक ड्रग्स) के खिलाफ छेड़ी गई लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के हालिया विधानसभा में दिये भाषण में यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। उन्होंने साफ कहा है कि चाहे कोई कितना भी प्रभावशाली व्यक्ति क्यों न हो, नशा तस्करी में शामिल किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
सरकार द्वारा चलाए जा रहे इस व्यापक अभियान में पुलिस की भूमिका अहम रही है। तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, संपत्तियों की जब्ती और यहां तक कि अपने ही विभाग के दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई—ये सभी कदम इस बात के संकेत हैं कि सरकार इस समस्या को जड़ से खत्म करने का इरादा रखती है। विशेष रूप से एसटीएफ कर्मचारियों की संलिप्तता को उजागर कर कार्रवाई करना, सिस्टम के भीतर आत्मशुद्धि का उदाहरण है।
हालांकि, इस पूरे मुद्दे पर राजनीति भी चरम पर है। मुख्यमंत्री ने विपक्ष, खासकर जयराम ठाकुर और भाजपा पर आरोप लगाया है कि वे इस गंभीर सामाजिक समस्या को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि नशे जैसी चुनौती को राजनीतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए.
सच यही है कि चिट्टे जैसी घातक समस्या किसी एक सरकार या दल की विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों से पनपती सामाजिक और प्रशासनिक कमजोरियों का नतीजा है। आरोप-प्रत्यारोप से समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। जरूरत इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर एक साझा रणनीति बनाएं, ताकि युवाओं को इस दलदल से बाहर निकाला जा सके।
सरकार द्वारा प्रस्तावित “एंटी चिट्टा वॉकथान” जैसे कार्यक्रम जन-जागरूकता की दिशा में सकारात्मक कदम हैं, लेकिन इनका वास्तविक प्रभाव तभी दिखेगा जब समाज का हर वर्ग इसमें भागीदारी सुनिश्चित करे।अंततः, यह लड़ाई केवल कानून और व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी परीक्षा है। यदि इसे राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर लड़ा जाए, तो ही हिमाचल को नशे के इस अभिशाप से मुक्त कराया जा सकता है।

