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रैहन स्टेडियम: सियासत के साये में दम तोड़ती खेल उम्मीदें, स्पोर्ट्स नीति पर उठते सवाल

RamParkash Vats
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रैहन(कांगड़ा) 19 मार्च 2026, ब्यूरो चीफ विजय समयाल
हिमाचल प्रदेश सरकार की खेल नीति कितनी प्रभावी है, इसका वास्तविक आकलन कागज़ों पर नहीं बल्कि धरातल पर मौजूद हालात से होता है। जिला कांगड़ा की फतेहपुर विधानसभा के कस्बा रैहन में बना स्टेडियम इस हकीकत का जीवंत उदाहरण है—जहां खेलों के सपनों की बजाय उपेक्षा की धूल ज्यादा दिखाई देती है।

करीब 34 वर्षों पहले 1987-88 में 60 कनाल भूमि पर शुरू हुआ यह स्टेडियम आज भी अधूरा पड़ा है। शुरुआती दौर में खिलाड़ियों के लिए मंच, ड्रेसिंग रूम, दर्शकों के बैठने की व्यवस्था, फ्लडलाइट्स और तारबंदी जैसे कार्य जरूर हुए, लेकिन इसके बाद विकास की रफ्तार थम गई। नतीजतन, यह स्टेडियम आज भी अपनी पूर्ण पहचान के लिए तरस रहा है।
यह मैदान अपनी लोकेशन और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण बेहद खास है, लेकिन विडंबना यह है कि इसका उपयोग खेल गतिविधियों से अधिक राजनीतिक रैलियों और हेलिपैड के रूप में होता रहा है। देश के कई बड़े नेता—प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री, केंद्रीय नेता और प्रदेश के मुख्यमंत्री—यहां आ चुके हैं, लेकिन उनके दौरे विकास की बजाय घोषणाओं तक ही सीमित रहे।

स्थानीय युवाओं में इस स्थिति को लेकर भारी रोष है। उनका कहना है कि जिस उद्देश्य से इस स्टेडियम की नींव रखी गई थी, वह आज तक पूरा नहीं हो पाया। अधूरी सुविधाएं, गंदगी और उपेक्षा ने उनके खेल सपनों को कमजोर कर दिया है। युवा मानते हैं कि यदि यह स्टेडियम पूरी तरह विकसित हो जाए, तो क्षेत्र की प्रतिभाएं राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकती हैं।
आज स्थिति यह है कि यह स्टेडियम शिक्षा विभाग के अधीन है, लेकिन विभाग द्वारा भी इसके समुचित विकास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या प्रदेश की खेल नीति केवल घोषणाओं तक सीमित है, या वास्तव में जमीनी स्तर पर भी लागू हो रही है?

हालांकि, अब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर से कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। विकास खंड अधिकारी द्वारा सफाई और सुधार का आश्वासन दिया गया है। वहीं, स्थानीय विधायक भवानी सिंह पठानिया ने पांच करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक इनडोर स्टेडियम निर्माण की बात कही है, जिसका शिलान्यास भी हो चुका है।

यह पहल निश्चित रूप से उम्मीद जगाती है, लेकिन असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन की होगी। सवाल अभी भी कायम है—क्या रैहन स्टेडियम अपने वास्तविक स्वरूप में लौट पाएगा, या फिर यह भी अधूरी योजनाओं की सूची में शामिल हो जाएगा?

रैहन का यह मैदान केवल एक खेल परिसर नहीं, बल्कि युवाओं के सपनों, उम्मीदों और संघर्ष का प्रतीक है। यदि इसे समय रहते विकसित नहीं किया गया, तो यह प्रदेश की खेल नीति की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना जाएगा।

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