भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन संपादक राम प्रकाश बत्स
न्यायालय में उन्होंने निर्भीक अमर बलिदानी – मदन लाल ढिंगरा ने गरजते हुए कहा—
““मेरे जैसे पुत्र के पास अपनी मातृभूमि को देने के लिए अपने रक्त के अतिरिक्त कुछ नहीं है, इसलिए मैंने वही रक्त उसकी वेदी पर अर्पित कर दिया।”

जब कोई युवक यह संकल्प कर ले कि उसका जन्म केवल मातृभूमि की सेवा के लिए हुआ है, तब उसके मन में मृत्यु का भय नहीं रहता। ऐसी ही अदम्य इच्छा शक्ति, अटूट साहस और समर्पण भावना के प्रतीक थे महान स्वतंत्रता सेनानी Madan Lal Dhingra। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब देशभक्ति हृदय में प्रज्वलित हो जाती है, तो व्यक्ति अपने प्राणों को भी तुच्छ समझने लगता है।
मदन लाल ढिंगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को पंजाब के Amritsar में एक संपन्न और शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता Ditta Mal Dhingra एक प्रतिष्ठित सिविल सर्जन थे। परिवार में किसी प्रकार की कमी नहीं थी, लेकिन ढिंगरा के मन में बचपन से ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की तीव्र इच्छा थी। भारत की गरीबी, अंग्रेजों का अत्याचार और देशवासियों की दयनीय स्थिति उन्हें भीतर तक विचलित करती थी।

लाहौर में पढ़ाई के दौरान उनके मन में राष्ट्रवाद की भावना और प्रबल हो गई। उन्होंने महसूस किया कि भारत की आर्थिक दुर्दशा का मूल कारण अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियाँ हैं। इसी कारण उन्होंने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया। जब कॉलेज प्रशासन ने छात्रों को ब्रिटेन से आयातित कपड़े का ब्लेज़र पहनने का आदेश दिया, तो ढिंगरा ने उसका खुलकर विरोध किया। परिणामस्वरूप उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया।
यह घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गई। उन्होंने आरामदायक जीवन को त्यागकर संघर्ष का मार्ग चुन लिया। कुछ समय तक उन्होंने छोटे-मोटे कार्य किए, मजदूरी भी की, परंतु उनके मन में एक ही विचार था—भारत को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करना।
1906 में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड पहुँचे और University College London में मैकेनिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन शुरू किया। वहीं उनका संपर्क महान क्रांतिकारी Vinayak Damodar Savarkar और Shyamji Krishna Varma से हुआ। लंदन में स्थित India House उस समय भारतीय क्रांतिकारियों का केंद्र था। यहाँ आकर ढिंगरा का जीवन पूरी तरह बदल गया और उनका मन मातृभूमि के लिए बलिदान देने को तत्पर हो उठा।
1 जुलाई 1909 की शाम लंदन के Imperial Institute में एक समारोह आयोजित था। उसी अवसर पर ढिंगरा ने अंग्रेज अधिकारी William Hutt Curzon Wyllie पर गोलियाँ चला दीं। यह घटना अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय क्रांतिकारियों के साहस का प्रतीक बन गई। ढिंगरा को वहीं गिरफ्तार कर लिया गया, परंतु उनके चेहरे पर भय का कोई चिन्ह नहीं था।
न्यायालय में उन्होंने निर्भीक होकर कहा—
““मेरे जैसे पुत्र के पास अपनी मातृभूमि को देने के लिए अपने रक्त के अतिरिक्त कुछ नहीं है, इसलिए मैंने वही रक्त उसकी वेदी पर अर्पित कर दिया।”
यह शब्द केवल एक क्रांतिकारी के नहीं थे, बल्कि उस पुत्र के थे जो अपनी माँ—भारत माता—के लिए मरने को भी सौभाग्य समझता था। ढिंगरा ने स्पष्ट कहा कि जब राष्ट्र गुलाम हो और खुले युद्ध की शक्ति न हो, तब अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना ही सच्चा कर्तव्य है।
17 अगस्त 1909 को उन्हें फाँसी दे दी गई, लेकिन उनकी शहादत ने पूरे भारत में क्रांति की नई चेतना जगा दी। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि जो व्यक्ति मातृभूमि के लिए जीता है, उसे मृत्यु का भय नहीं होता।
मदन लाल ढिंगरा का जीवन हमें यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल शब्द नहीं, बल्कि बलिदान की वह अग्नि है जिसमें असंख्य वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। उनका समर्पण आज भी हर भारतीय को यह प्रेरणा देता है कि यदि देश के लिए आवश्यकता पड़े, तो अपने स्वार्थ और जीवन से ऊपर उठकर मातृभूमि की सेवा करनी चाहिए

