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धारावाहिक (42) भारत के स्वतंत्र सैनानी कोरी कांड के युवा क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त 13 वर्ष की आयु में क्रांति की राह पर चल पढे़

RamParkash Vats
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भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन संपादक राम प्रकाश बत्स

भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करवाने के लिए लाखों भारतीयों ने अपना जीवन, संघर्ष और बलिदान अर्पित किया। अंग्रेज़ी हुकूमत के जुल्मों और अत्याचारों के सामने अनेक वीरों ने बिना भय के आज़ादी की मशाल जलाए रखी। इन्हीं साहसी क्रांतिकारियों में एक नाम था मन्मथनाथ गुप्त का, जिनका जीवन संघर्ष, साहस और साहित्य का अद्भुत संगम रहा।

मन्मथनाथ गुप्त का जन्म 7 फरवरी 1908 को हुआ। वे बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। उस समय भारत पर ब्रिटिश शासन का अत्याचार चरम पर था और स्वतंत्रता की चाह रखने वाले युवाओं के मन में विद्रोह की ज्वाला जल रही थी। यही कारण था कि मात्र 13 वर्ष की छोटी आयु में ही मन्मथनाथ गुप्त स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया। इतनी कम उम्र में जेल जाना उनके साहस और देशप्रेम का प्रमाण था।

बाद में वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बने। यह संगठन अंग्रेज़ी शासन को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से कार्य करता था। इसी संगठन के नेतृत्व में 9 अगस्त 1925 को ऐतिहासिक काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया, जिसमें मन्मथनाथ गुप्त ने भी सक्रिय भाग लिया। उस समय उनकी आयु मात्र 17 वर्ष थी।

काकोरी कांड में क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ी सरकार के खजाने को ले जा रही ट्रेन को लूटकर ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी थी। इस घटना में महान क्रांतिकारी जैसे राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह शामिल थे। दुर्भाग्यवश इस घटना के दौरान मन्मथनाथ गुप्त की असावधानी से गोली चल गई और अहमद अली नामक एक रेल यात्री की मृत्यु हो गई। इस घटना को अंग्रेज़ी सरकार ने क्रांतिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का आधार बना लिया।

परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने चार क्रांतिकारियों—राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह—को फाँसी की सजा सुना दी। मन्मथनाथ गुप्त उस समय नाबालिग थे, इसलिए उन्हें 14 वर्ष की कठोर कारावास की सजा दी गई। जेल की कठिन यातनाएँ भी उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सकीं।

सन् 1937 में जब वे जेल से रिहा हुए तो उन्होंने अपनी लेखनी को क्रांति का माध्यम बनाया। उन्होंने क्रांतिकारी विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अनेक लेख और पुस्तकें लिखीं। अंग्रेज़ सरकार उनकी लेखनी से भी भयभीत थी, इसलिए 1939 में उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया। वे 1946 तक जेल में रहे और भारत की स्वतंत्रता से ठीक एक वर्ष पहले ही रिहा हुए।

स्वतंत्र भारत में मन्मथनाथ गुप्त ने साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं—योजना, बाल भारती और आजकल—के संपादक रहे। उनकी रचनाओं में इतिहास, आत्मकथा और कथा साहित्य का समृद्ध मिश्रण मिलता है। उन्होंने हिंदी, अंग्रेज़ी और बांग्ला भाषाओं में अनेक महत्वपूर्ण कृतियाँ लिखीं, जिनसे स्वतंत्रता आंदोलन के कई अनछुए पहलू सामने आए।

26 अक्टूबर 2000 को दीपावली के दिन नई दिल्ली के निजामुद्दीन ईस्ट स्थित अपने निवास पर उनका जीवन दीप सदा के लिए बुझ गया। परन्तु उनका संघर्ष, उनका साहित्य और उनका क्रांतिकारी जीवन आज भी भारतीयों को प्रेरणा देता है।

मन्मथनाथ गुप्त का जीवन हमें यह सिखाता है कि देशभक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि साहस, त्याग और कर्म से सिद्ध होती है। वे उन महान सपूतों में से थे जिन्होंने अपनी जवानी भारत की स्वतंत्रता के नाम समर्पित कर दी। आज स्वतंत्र भारत उनके बलिदान और योगदान का सदा ऋणी रहेगा।

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