न्यूज इंडिया आजतक भारत के स्वतंत्र सैनानी तेजस्वी और समर्पित नाम भवभूषण मित्र को कोटि कोटि नमन संपादक राम प्रकाश बत्स
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल घटनाओं का वर्णन नहीं है, बल्कि यह त्याग, तपस्या और अदम्य साहस की ऐसी अमर गाथा है जिसने लाखों भारतीयों को गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की प्रेरणा दी। इन्हीं महान क्रांतिकारियों में एक तेजस्वी और समर्पित नाम है भवभूषण मित्र का, जिनका जीवन राष्ट्रभक्ति और बलिदान का अद्भुत उदाहरण है।

भारत के स्वाभिमानी स्वतंत्र सैनानी भवभूषण मित्र धारावाहिक(38) संपादकीय लेख
भवभूषण मित्र का जन्म 27 जनवरी 1881 को अविभाजित बंगाल में हुआ था। बचपन से ही उनमें देश के प्रति गहरा प्रेम और अन्याय के विरुद्ध विद्रोह की भावना थी। उस समय भारत अंग्रेजी हुकूमत की कठोर गुलामी झेल रहा था। देश की जनता पर अत्याचार, दमन और अन्याय का पहाड़ टूट रहा था। ऐसे वातावरण में अनेक युवाओं के मन में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित हुई और उन्हीं युवाओं में भवभूषण मित्र भी शामिल थे।
युवावस्था में वे बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े। उस समय बंगाल में क्रांति की लहर उठ रही थी और अनेक संगठन अंग्रेजी शासन को चुनौती दे रहे थे। भवभूषण मित्र का संपर्क प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन युगांतर दल से हुआ, जिसने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाया था। यह संगठन महान क्रांतिकारी बाघा जतिन की प्रेरणा से संचालित था।
भवभूषण मित्र ने इस संगठन के माध्यम से देशभक्ति की अलख जगाई और युवाओं को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। वे उन क्रांतिकारियों में से थे जो मानते थे कि यदि मातृभूमि को आज़ाद कराना है तो साहस, संगठन और बलिदान की आवश्यकता होगी।
उनका नाम प्रसिद्ध अलीपुर बम कांड से भी जुड़ा रहा। यह वह घटना थी जिसने अंग्रेजी शासन को हिला कर रख दिया था। इस मामले में कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया और अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए। भवभूषण मित्र भी अंग्रेजों की नजरों में आ गए और उन्हें कई कठिनाइयों और यातनाओं का सामना करना पड़ा।
लेकिन इन कठिन परिस्थितियों ने उनके मनोबल को कमजोर नहीं किया। वे निरंतर स्वतंत्रता की लड़ाई में सक्रिय रहे। जब विदेशों में रह रहे भारतीयों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह का आह्वान किया, तब उन्होंने भी गदर विद्रोह की भावना से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा देने का प्रयास किया।
समय के साथ जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश में जनांदोलन प्रारंभ हुए, तब भवभूषण मित्र ने भी पूरे समर्पण के साथ इन आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और जनता को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध एकजुट होने के लिए प्रेरित किया।
क्रांतिकारी जीवन के साथ-साथ वे समाज सेवा के क्षेत्र में भी अग्रणी रहे। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जागरण का भी प्रतीक है। बाद के वर्षों में उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपनाया और “स्वामी सत्यानंद पुरी” के नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
सन्यास का मार्ग अपनाने के बाद भी उन्होंने देशभक्ति की भावना को कभी कमजोर नहीं होने दिया। वे युवाओं को राष्ट्र सेवा, त्याग और चरित्र निर्माण का संदेश देते रहे। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि सच्चा देशभक्त किसी पद या प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि मातृभूमि की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए जीता है।
27 जनवरी 1970 को इस महान क्रांतिकारी ने इस संसार को अलविदा कहा, लेकिन उनका जीवन और संघर्ष आज भी हमें प्रेरणा देता है। भवभूषण मित्र जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है।
जब भी हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस लेते हैं, तब हमें उन वीरों को नमन करना चाहिए जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें यह स्वतंत्रता दिलाई। भवभूषण मित्र का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति त्याग, साहस और समर्पण से ही जन्म लेती है, और ऐसे महान सेनानियों का बलिदान सदैव अमर रहेगा।

