भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन :संपादक राम प्रकाश वत्स

जब-जब इस पावन भूमि पर पराधीनता की जंजीरें कसी गईं, तब-तब भारत माँ के सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वाधीनता की ज्योति प्रज्वलित की। उन्हीं अमर सेनानियों में एक तेजस्वी, दूरदर्शी और अदम्य साहस से परिपूर्ण नाम है — पंडित जवाहरलाल नेहरू। वे केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के योद्धा और आधुनिक भारत के शिल्पकार भी थे।

14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में जन्मे नेहरू जी ने कैम्ब्रिज और लंदन से उच्च शिक्षा प्राप्त की। सन् 1912 में भारत लौटकर उन्होंने वकालत आरंभ की, परंतु देश की दासता ने उनके अंतर्मन को झकझोर दिया और वे शीघ्र ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ओजस्वी और युवा नेता के रूप में उन्होंने 1929 के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज्य’ का ध्वज बुलंद किया। वे महात्मा गांधी के विचारों से गहराई से प्रेरित थे और असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाई। ब्रिटिश हुकूमत ने उनके उत्साह को कुचलने हेतु उन्हें लगभग नौ बार कारागार में डाला, किंतु जेल की दीवारें भी उनके विचारों को कैद न कर सकीं। वहीं उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति An Autobiography की रचना की।

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही नेहरू जी ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्र की बागडोर संभाली। उन्होंने लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता के सिद्धांतों पर आधुनिक भारत की नींव रखी। औद्योगीकरण, कृषि सुधार और शिक्षा के विस्तार पर विशेष बल देते हुए उन्होंने योजना आयोग की स्थापना की, जिसने देश के नियोजित विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
विदेश नीति में उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अवधारणा को साकार रूप दिया, जिससे भारत शीत युद्ध की प्रतिस्पर्धा से दूर रहते हुए स्वतंत्र नीति अपना सका। बच्चों के प्रति उनके अपार स्नेह के कारण वे “चाचा नेहरू” के नाम से विख्यात हुए, और उनका जन्मदिन आज भी बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस प्रकार पंडित जवाहरलाल नेहरू का जीवन त्याग, संघर्ष और राष्ट्र-नवनिर्माण की एक उज्ज्वल गाथा है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देत

