Reading: धारावाहिक (21) भारत के स्वतंत्र सैनानी :भाई बालमुकुन्द: लार्ड हार्डिंग बम कांड के अमर क्रांतिकारी, जिन्होंने हँसते-हँसते फाँसी स्वीकार कर राष्ट्र स्वाधीनता हेतु अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया

धारावाहिक (21) भारत के स्वतंत्र सैनानी :भाई बालमुकुन्द: लार्ड हार्डिंग बम कांड के अमर क्रांतिकारी, जिन्होंने हँसते-हँसते फाँसी स्वीकार कर राष्ट्र स्वाधीनता हेतु अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया

RamParkash Vats
4 Min Read

भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन :-भाई बालमुकुन्द का वलिदान का इतिहास: संपादक राम प्रकाश वत्स

भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं है; उसकी आधारशिला उन अनगिनत क्रांतिधर्माओं के रक्त से सिंचित है, जिन्हें समय के प्रवाह ने धुंधला कर दिया। ऐसे ही एक अमर हुतात्मा थे भाई बालमुकुन्द, जिनका बलिदान 11 मई 1915 को हुआ। वे उस ऐतिहासिक प्रकरण के प्रमुख पात्र थे, जिसमें 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में तत्कालीन वायसराय Lord Hardinge पर बम फेंका गया। इस साहसिक योजना के सूत्रधार थे रास बिहारी बोस, और बम फेंकने का कार्य किया था बसंत कुमार विश्वास ने।
भाई बालमुकुन्द का जन्म 1885 में वर्तमान पाकिस्तान के झेलम जिले के करियाला गाँव में हुआ। वे उस गौरवशाली वंश के उत्तराधिकारी थे, जिसने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर किए थे। उनके पूर्वज भाई मतिदास और भाई सतिदास ने गुरु गुरु तेग बहादुर के साथ औरंगज़ेब के अत्याचारों के विरुद्ध अद्वितीय बलिदान दिया था। यही परंपरा उनके संस्कारों में देशभक्ति और आत्मोत्सर्ग की ज्योति बनकर प्रज्वलित रही।
लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने अध्यापन कार्य अपनाया, परंतु उनका मन अंग्रेजी दासता को सहन करने को तैयार नहीं था। वे शीघ्र ही क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए और दिल्ली के प्रसिद्ध क्रांतिकारी मास्टर अमीरचंद तथा अन्य साथियों के साथ संगठनात्मक कार्य करने लगे। बम निर्माण, गुप्त साहित्य का लेखन और प्रचार—इन सभी में उनकी सक्रिय भूमिका थी।
जब अंग्रेजों ने राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की, तब क्रांतिकारियों ने यह अवसर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने हेतु चुना। 23 दिसंबर 1912 को निकली शाही शोभायात्रा में वायसराय पर बम फेंका गया। यद्यपि वायसराय बच गया, पर इस घटना ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। इस षड्यंत्र में भाई बालमुकुन्द की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। वे गुप्त रूप से योजना के संचालन और सहयोग में संलग्न रहे।
17 मई 1913 को लाहौर के लॉरेंस गार्डन में अंग्रेज अधिकारियों पर हुए बम प्रकरण से भी उनका नाम जुड़ा। अंततः पुलिस जांच के दौरान विश्वासघात के कारण वे गिरफ्तार कर लिए गए। उनके विरुद्ध “दिल्ली-लाहौर षड्यंत्र केस” चलाया गया। 5 अक्टूबर 1914 को उन्हें, मास्टर अमीरचंद, अवध बिहारी और बसंत कुमार विश्वास के साथ फाँसी की सजा सुनाई गई।
11 मई 1915 को अंबाला केंद्रीय कारागार में वे हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। कहा जाता है कि निर्णय सुनते समय उन्होंने गर्व से कहा कि उन्होंने अपने कुल की परंपरा को कलंकित नहीं होने दिया—पूर्वजों ने धर्म के लिए बलिदान दिया था, और वे राष्ट्र के लिए प्राण अर्पित कर रहे हैं।
उनकी पत्नी लज्जावती का त्याग भी कम प्रेरक नहीं था। विवाह के एक वर्ष के भीतर ही वे विधवा हो गईं। पति के कष्टों को साझा करने के लिए उन्होंने स्वयं कठोर जीवन अपनाया और अंततः व्रत-उपवास करते हुए प्राण त्याग दिए। यह त्याग भारतीय नारी की अद्भुत निष्ठा और समर्पण का उदाहरण है।
आज दिल्ली में उनके नाम पर एक विद्यालय अवश्य है, पर राष्ट्रीय स्मृति में उनका स्थान अपेक्षित सम्मान नहीं पा सका। यह हमारी ऐतिहासिक चेतना की परीक्षा है कि हम ऐसे हुतात्माओं को केवल स्मरण ही न करें, बल्कि उनके आदर्शों—त्याग, साहस और राष्ट्रनिष्ठा—को अपने जीवन में उतारें।
भाई बालमुकुन्द का जीवन हमें बताता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मबल और त्याग की परिणति है। ऐसे अमर बलिदानी को शत-शत नमन।

Share This Article
Leave a comment
error: Content is protected !!