Serial (8) Independent fighter Lokmanya Bal Gangadhar Tilak
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम एक ऐसे विचारक, योद्धा और संपादक के रूप में अंकित है, जिन्होंने गुलामी की जड़ों पर सबसे पहले निर्भीक प्रहार किया। तिलक केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे उस चेतना के प्रतीक थे, जिसने भारतीय समाज को आत्मसम्मान, स्वराज और सक्रिय प्रतिरोध का मार्ग दिखाया। अंग्रेजी शासन के दौर में जब राजनीतिक संघर्ष सीमित याचिकाओं और प्रार्थनाओं तक सिमटा हुआ था, तब तिलक ने राष्ट्र को यह विश्वास दिलाया कि स्वतंत्रता मांगने से नहीं, संघर्ष से मिलती है।

स्वतंत्र सेनानी बालगंगाधर तिलक
23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में जन्मे बाल गंगाधर तिलक का पालन-पोषण एक संस्कारित और शिक्षित परिवार में हुआ। उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे, जिनसे तिलक को भारतीय संस्कृति, इतिहास और धर्म का गहरा ज्ञान मिला। यही कारण था कि आगे चलकर तिलक ने राष्ट्रीय आंदोलन को भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा। डेक्कन कॉलेज, पुणे से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने शिक्षक, समाज सुधारक और पत्रकार के रूप में कार्य आरंभ किया, लेकिन शीघ्र ही उनका जीवन पूर्णतः राष्ट्रसेवा को समर्पित हो गया।
तिलक का मानना था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का आधार है। इसी उद्देश्य से उन्होंने दक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना में भूमिका निभाई। परंतु उनका सबसे प्रभावशाली योगदान पत्रकारिता के क्षेत्र में रहा। ‘केसरी’ और ‘मराठा’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से तिलक ने ब्रिटिश शासन की नीतियों, शोषण और अन्याय को निर्भीकता से उजागर किया। उनकी लेखनी में न तो भय था और न ही समझौते की भाषा। यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार उन्हें सबसे खतरनाक नेताओं में गिनने लगी

लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति का एक दुर्लभ चित्र जिसमें बायें से लाला लाजपतराय, बीच में लोक्मान्य तिलक जी और सबसे दायें श्री बिपिनचन्द्र पाल बैठे हैं
लोकमान्य तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र राष्ट्रवादी धड़े के प्रमुख नेता थे। वे मानते थे कि केवल संवैधानिक सुधारों की मांग से अंग्रेज सत्ता नहीं छोड़ेगी। उनका ऐतिहासिक उद्घोष— “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”— केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की पुकार बन गया। इस वाक्य ने देश के कोने-कोने में सोई हुई चेतना को झकझोर दिया और आम जनमानस को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।

सन 1956 में लोकमान्य तिलक पर भारत सरकार द्वारा जारी एक डाक टिकट
अंग्रेज सरकार ने तिलक की लोकप्रियता और प्रभाव को कुचलने के लिए उन्हें कई बार जेल में डाला। 1908 में उन्हें देशद्रोह के आरोप में बर्मा के मांडले कारागार भेज दिया गया। कठोर कारावास के दौरान भी तिलक का मनोबल नहीं टूटा। वहीं उन्होंने ‘गीता रहस्य’ जैसे महान ग्रंथ की रचना की, जिसमें कर्मयोग के सिद्धांत को राष्ट्रीय संघर्ष से जोड़ा। तिलक ने स्पष्ट किया कि अन्याय के विरुद्ध कर्म करना ही सच्चा धर्म है।
तिलक की दूरदर्शिता का प्रमाण यह भी है कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक रूप देकर सामाजिक एकता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया। इन उत्सवों के माध्यम से जनता संगठित हुई, विचारों का आदान-प्रदान हुआ और राष्ट्रवाद घर-घर तक पहुँचा। यह ब्रिटिश “फूट डालो और राज करो” नीति के विरुद्ध एक सशक्त सामाजिक प्रतिरोध था।

सन 1907 में सूरत कांग्रेस के पश्चात राष्ट्रवादियों की सभा को सम्बोधित करते हुए बालगंगाधर तिलक । इस सभा की अध्यक्षता अरविन्द घोष ने की थी।
: 1916 में तिलक ने एनी बेसेंट के साथ मिलकर होमरूल आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन ने स्वशासन की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती दी और स्वतंत्रता संग्राम को नई गति प्रदान की। यद्यपि आगे चलकर कांग्रेस में गांधीजी के नेतृत्व में आंदोलन की रणनीति बदली, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि तिलक ने संघर्ष की जो नींव रखी, उसी पर आगे की इमारत खड़ी हुई।
1 अगस्त 1920 को लोकमान्य तिलक का निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं। महात्मा गांधी ने उन्हें “आधुनिक भारत का निर्माता” कहा था। तिलक का जीवन हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना का प्रश्न है। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस युगपुरुष थे, जिन्होंने सबसे पहले निर्भीक होकर स्वराज का उद्घोष किया और आने वाली पीढ़ियों को संघर्ष का मार्ग दिखाया।।

