अल्प सेवाकाल वाले सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पीड़ा
NEWS INDIA AAJ TAK , INDIA NEWS DESK ,संपादक राम प्रकाश वत्स
सरकारी सेवा को आमतौर पर सुरक्षा, सम्मान और बुढ़ापे में सहारे का प्रतीक माना जाता है। किंतु व्यवस्था की कुछ तकनीकी शर्तें ऐसी भी हैं, जो वर्षों तक निष्ठा से सेवा देने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद शून्य पर ला खड़ा करती हैं। हिमाचल प्रदेश में 3, 5 या 9 वर्ष तक सरकारी सेवा देने वाले ऐसे ही सैकड़ों नहीं, बल्कि लगभग 2,000 से 3,000 कर्मचारी और अधिकारी आज किसी भी प्रकार की पेंशन या वित्तीय सहायता से वंचित हैं।
इन कर्मचारियों ने सरकार की सेवा पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से की, परंतु 10 वर्ष की न्यूनतम सेवाकाल की तकनीकी शर्त उनके जीवन की सबसे बड़ी बाधा बन गई। परिणामस्वरूप, बुढ़ापे के उस दौर में, जब सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, वे आजीविका के किसी भी सुनिश्चित साधन से वंचित हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक कठोरता को दर्शाती है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
इसी पीड़ा को स्वर देते हुए 10 वर्ष से कम सेवाकाल वाले सेवानिवृत्त कर्मचारी अधिकारी महासंघ, हिमाचल प्रदेश ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव एवं वित्त सचिव को 22 जनवरी को एक मांग पत्र सौंपा। महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजीव गुलेरिया और वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. विपन महाजन ने आगामी राज्य बजट में इस वर्ग के लिए सम्मानजनक मानदेय अथवा पेंशन का प्रावधान करने की मांग की है।
महासंघ का तर्क पूरी तरह मानवीय और व्यावहारिक है। यह वर्ग संख्या में छोटा है और इस पर होने वाला खर्च राज्य के बजट पर कोई बड़ा बोझ नहीं डालेगा। इसके विपरीत, यह कदम उन परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देगा, जिन्होंने वर्षों तक सरकार पर भरोसा कर जीवन बिताया। ‘जीवन जीने का अधिकार’ केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की गारंटी भी देता है।

