भारत के स्वतंत्र सैनानी धारावाहिक –3
सिरमौर से स्वतंत्र सैनानी वैद्य सूरत सिंह
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की दुर्गम, वनाच्छादित और संघर्षशील पहाड़ियों से निकलने वाला बझेतु खड्ड जिस वादी को जीवन देता है, वही क्षेत्र इतिहास में पझौता के नाम से अमर हो गया। पझौता केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि वह पवित्र भूमि है जहाँ मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पित करने की चेतना ने जन्म लिया। इसी भूमि से सिरमौर रियासत की दमनकारी राजशाही और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संगठित जनआंदोलन की पहली चिंगारी फूटी, जिसने आगे चलकर पझौता आंदोलन का रूप लिया और देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
ब्रिटिश संरक्षण में चल रही सिरमौर रियासत में आम जनता पर भारी करों का बोझ, बेगार प्रथा की अमानवीय व्यवस्था और निरंतर दमन ने जनजीवन को असहनीय बना दिया था। किसान, मजदूर और साधारण ग्रामीण अपने ही श्रम और भूमि पर पराधीन जीवन जीने को विवश थे। ऐसे अंधकारमय समय में पझौता की धरती से जो आवाज़ उठी, वह केवल स्थानीय विरोध नहीं थी, बल्कि वह भारत की आज़ादी के महासंग्राम से जुड़ी एक सशक्त कड़ी थी।
इस आंदोलन के महानायक वैद्य सूरत सिंह थे—एक ऐसे सेनानी जिन्होंने अपने वैद्यक ज्ञान के साथ-साथ राष्ट्रभक्ति, त्याग और साहस को जीवन का मूल मंत्र बनाया। वे जनसाधारण के दुख-दर्द को समझते थे और जानते थे कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण जीवन का अधिकार है। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया, उन्हें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिया और मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने की भावना से ओत-प्रोत किया।
पझौता आंदोलन का स्वरूप पूरी तरह अहिंसक, लेकिन संकल्प में अडिग था। यह आंदोलन देश के स्वतंत्रता संग्राम की उसी धारा में प्रवाहित हुआ, जिसमें सत्य, साहस और बलिदान सर्वोपरि थे। वर्ष 1942 में जब महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर दिया, तब पझौता की पहाड़ियों में भी आज़ादी की हुंकार और तेज हो गई। इस प्रकार पझौता आंदोलन केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष न रहकर, राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न अंग बन गया।
आंदोलन की बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर रियासती प्रशासन और अंग्रेजी सत्ता ने दमन का सहारा लिया। निर्दोष आंदोलनकारियों की गिरफ्तारियाँ हुईं, यातनाएँ दी गईं और वैद्य सूरत सिंह सहित अनेक देशभक्तों को कठोर कष्ट सहने पड़े। परंतु मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने का संकल्प इतना दृढ़ था कि अत्याचारों के बावजूद आंदोलन की लौ बुझी नहीं। पझौता की धरती पर संघर्षरत सेनानियों ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता की चाह को न तो जेल की सलाखें रोक सकती हैं और न ही सत्ता का भय।
पझौता आंदोलन ने देश को ऐसे दिलेर सेनानी दिए, जिन्होंने बिना किसी लोभ या स्वार्थ के केवल भारत माता की सेवा को अपना धर्म माना। यह आंदोलन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि भारत की आज़ादी केवल महानगरों या बड़े नेताओं की देन नहीं, बल्कि दूरस्थ पहाड़ियों, छोटे गांवों और अनाम बलिदानियों के त्याग से संभव हुई।आज पझौता आंदोलन और वैद्य सूरत सिंह का संघर्ष हमें यह संदेश देता है कि मातृभूमि के लिए किया गया हर बलिदान इतिहास बन जाता है। सिरमौर की यह वीर भूमि स्वतंत्रता संग्राम का वह उज्ज्वल अध्याय है, जहाँ देश की स्वतंत्रता के लिए प्राण न्योछावर करने का संकल्प पहाड़ों की तरह अडिग और नदियों की तरह निरंतर प्रवाहित रहा।

