Editer Ram Parkash Vats, Newsindiaaajtak.com
*जवाली और फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र हिमाचल प्रदेश की राजनीति के सबसे संवेदनशील और निर्णायक क्षेत्र माने जाते हैं। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला हमेशा “नेट टू नट” रहा है—ऐसा संघर्ष जिसमें अंतिम बूथ का परिणाम आने तक प्रत्याशियों और रणनीतिकारों की धड़कनें थमी नहीं रहतीं। इन्हीं कारणों से इन दोनों क्षेत्रों में संगठनात्मक अनुशासन, सामूहिक रणनीति और नेतृत्व के प्रति मर्यादा का महत्व अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक हो जाता है। दुर्भाग्यवश, हालिया घटनाक्रम यह संकेत दे रहा है कि भाजपा इन कसौटियों पर स्वयं ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की ओर बढ़ रही है।
* जवाली विधानसभा में भाजपा के भीतर सुलग रही अंतरविरोध की चिंगारियां अब खुलकर सामने आने लगी हैं। टिकट की दौड़ में शामिल दावेदारों द्वारा अपनाए जा रहे हथकंडे न केवल पार्टी की आंतरिक मर्यादाओं को तोड़ रहे हैं, बल्कि सार्वजनिक मंच पर संगठन की छवि को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। टीआरपी और व्यक्तिगत प्रचार की होड़ में यह भूल जाना कि भाजपा एक अनुशासित और वैचारिक पार्टी है—सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हो सकती है। यही कारण है कि पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के कुठेड़ आगमन पर दो अलग-अलग गुटों द्वारा अलग-अलग स्वागत और नारेबाजी की घटनाएं केवल शिष्टाचारहीनता नहीं, बल्कि संगठनात्मक अविवेक का खुला प्रदर्शन हैं।
* जब शीर्ष नेता के साथ मंच तक गुटीय नारे पहुंच जाएं और स्वयं जयराम ठाकुर को भाषण के दौरान नसीहत देनी पड़े, तो यह केवल स्थानीय विवाद नहीं रहता, बल्कि यह संदेश प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक जाता है कि पार्टी के भीतर अनुशासन ढीला पड़ रहा है। भाजपा की पहचान हमेशा से मर्यादित आचरण, कैडर आधारित संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के प्रति विश्वास से जुड़ी रही है। यदि यही मूल तत्व कमजोर होते हैं, तो विरोधी दलों को बैठे-बिठाए राजनीतिक हथियार मिल जाते हैं।
* राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जवाली और फतेहपुर दोनों ही सीटों पर भाजपा किसी नए चेहरे को अवसर दे सकती है। यह रणनीति संगठनात्मक पुनर्संतुलन की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है, लेकिन मौजूदा माहौल में यह जोखिम भरी भी है। खासकर फतेहपुर विधानसभा में स्थिति “एक अनार, सौ बीमार” जैसी बनती जा रही है। संभावित टिकट दावेदारों की लंबी फेहरिस्त और उनका अलग-अलग प्रचार पार्टी के सामूहिक संदेश को कमजोर कर रहा है। जब प्रत्येक दावेदार स्वयं को ही पार्टी से बड़ा समझने लगे, तब चुनावी लड़ाई व्यक्ति केंद्रित हो जाती है, जबकि भाजपा की ताकत हमेशा विचार और संगठन केंद्रित रही है।
*सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भाषणबाजी में शब्दों की मर्यादा को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में तीखे स्वर स्वाभाविक हो सकते हैं, लेकिन जब वही स्वर पार्टी के भीतर जहर घोलने लगें, तो यह अच्छे संकेत नहीं होते। भाजपा को इस बात का आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के शोर में अपने विकास मॉडल और मूल मुद्दों को पीछे छोड़ती जा रही है। अपेक्षा यह थी कि नेता और कार्यकर्ता जनता के बीच मूलभूत विकास, अधोसंरचना, सुशासन और भाजपा के विकास मॉडल को लेकर जाएं। लेकिन इसके विपरीत, संदेश बिखरता हुआ और अंतर्विरोधों से भरा हुआ नजर आ रहा है।
*इस पूरे परिदृश्य का सबसे बड़ा लाभ कांग्रेस को मिलता दिख रहा है। जवाली और फतेहपुर दोनों ही क्षेत्रों में कांग्रेस के नेता—मंत्री चंद्र कुमार और भवानी पठानिया—मजबूत जनाधार वाले नेता हैं। उनका संगठनात्मक आधार सुदृढ़ है और कांग्रेस का किला यहां पहले से ही मजबूत माना जाता है। ऐसे में यदि भाजपा अपने ही घर को संभालने में विफल रहती है, तो कांग्रेस को किसी अतिरिक्त प्रयास की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
*अतः यह स्थिति भाजपा के लिए स्पष्ट चेतावनी है—एक खतरे की घंटी। समय रहते शीर्ष आलाकमान को संज्ञान लेना आवश्यक है। टिकट की दौड़ को मर्यादित ढांचे में लाना, गुटबाजी पर कठोर संदेश देना और संगठनात्मक अनुशासन को पुनर्स्थापित करना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। यदि भाजपा को जवाली और फतेहपुर जैसे निर्णायक क्षेत्रों में अपनी साख और संघर्षशीलता बनाए रखनी है, तो उसे यह समझना होगा कि चुनाव केवल व्यक्तियों से नहीं, बल्कि अनुशासित संगठन और स्पष्ट विचारधारा से जीते जाते हैं।

