संपादक राम प्रकाश वत्स
शिमला: हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने शिक्षा सुधारों के मंच से एक बार फिर यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि उसकी राजनीति का केंद्र “विकास” और “भविष्य” है। समग्र शिक्षा निदेशालय परिसर में एलईपी 2.0 की लॉन्चिंग और अत्याधुनिक विद्या समीक्षा केंद्र के उद्घाटन को सरकार ने केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में पेश किया—कि कांग्रेस सरकार शिक्षा के जरिए सत्ता के भरोसे को मजबूत करना चाहती है।मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू द्वारा अगले शैक्षणिक सत्र से स्कूलों में मोबाइल फोन पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा को जहां सरकार अनुशासन और एकाग्रता से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे “प्रतीकात्मक फैसला” करार दे सकता है। सवाल यह भी उठता है कि डिजिटल युग में मोबाइल पर पूर्ण प्रतिबंध क्या व्यावहारिक है या यह केवल एक सख्त छवि गढ़ने का प्रयास है। फिर भी, सरकार इसे शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और विद्यार्थियों के ध्यान भटकाव के खिलाफ साहसिक कदम के रूप में प्रचारित कर रही है।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो शिक्षा सुधारों की यह पूरी श्रृंखला कांग्रेस सरकार के तीन साल के कार्यकाल का “रिपोर्ट कार्ड” बनती जा रही है। मुख्यमंत्री का यह दावा कि हिमाचल शिक्षा गुणवत्ता रैंकिंग में 21वें से पांचवें स्थान पर पहुंच गया है, सीधे-सीधे पिछली सरकारों की नीतियों पर अप्रत्यक्ष सवाल खड़ा करता है। यह संदेश साफ है—कांग्रेस शासन में ही व्यवस्था में वास्तविक बदलाव संभव हुआ।विद्या समीक्षा केंद्र, ‘अभ्यास हिमाचल’, ‘निपुण प्रगति’ और स्मार्ट उपस्थिति प्रणाली जैसे डिजिटल नवाचार प्रशासनिक सुधार के साथ-साथ राजनीतिक नैरेटिव का भी हिस्सा हैं। सरकार यह जताना चाहती है कि अब फैसले अनुमान से नहीं, बल्कि आंकड़ों से होंगे। यह दावा पारदर्शिता की राजनीति को मजबूत करता है, हालांकि जमीनी हकीकत में इन योजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन अभी बाकी है।

भर्तियां: रोजगार की राजनीति का नया अध्याय
शिक्षा विभाग में व्यापक भर्तियों की घोषणा को केवल शैक्षणिक आवश्यकता तक सीमित नहीं देखा जा सकता। हिमाचल जैसे राज्य में जहां बेरोजगारी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, वहां अस्थायी और स्थायी भर्तियों का एलान युवाओं को साधने की रणनीति भी है। सरकार का यह कहना कि भर्तियां बैचवाइज और प्रतिस्पर्धा के आधार पर होंगी, विपक्ष के “पक्षपात” और “राजनीतिक हस्तक्षेप” के आरोपों का जवाब देने की कोशिश है।2032 तक हर विधानसभा क्षेत्र में देश के सर्वश्रेष्ठ स्कूल स्थापित करने का लक्ष्य दीर्घकालिक राजनीतिक विज़न का संकेत देता है। यह भविष्य की राजनीति के लिए नींव रखने जैसा है—जहां शिक्षा को विकास के सबसे मजबूत हथियार के रूप में पेश किया जा रहा है।
साक्षरता के आंकड़े और सियासी दावा
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर का 99.30 प्रतिशत साक्षरता दर का दावा सरकार के पक्ष में मजबूत तर्क जरूर है, लेकिन यह आंकड़ा राजनीतिक बहस का विषय भी बन सकता है। क्लस्टर स्कूल प्रणाली, मुफ्त जेईई-नीट कोचिंग और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से प्रशिक्षण जैसे कदम सरकार की “प्रगतिशील छवि” को चमकाने का काम कर रहे हैं।कुल मिलाकर, हिमाचल में शिक्षा सुधार अब केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुका है। सुक्खू सरकार शिक्षा को उपलब्धि, भरोसे और भविष्य की राजनीति—तीनों के प्रतीक के रूप में गढ़ने में जुटी है। सवाल बस इतना है कि क्या ये दावे जमीन पर भी उतनी ही मजबूती से उतर पाएंगे, जितनी मजबूती से मंच से पेश किए जा रहे हैं।

