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हिमाचल का विकास-दर्पण: उपलब्धियों की चमक के बीच संवेदनशील चुनौतियों का गहरा साया

RamParkash Vats
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संपादकीय चिंतन मंथन और विश्लेषण - संपादक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल प्रदेश बीते दो दशकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय परिवर्तन लाने में सफल रहा है। पहाड़ी भूगोल और सीमित संसाधनों के बावजूद राज्य ने मानव विकास के कई मानकों पर देश में नेतृत्व किया है। लेकिन इस चमकदार प्रगति के पीछे कई संवेदनशील चुनौतियाँ भी खड़ी हैं, जिनका सामना किए बिना विकास की गति स्थायी नहीं रह सकती।शिक्षा के क्षेत्र में हिमाचल ने एक मजबूत आधार तैयार किया है। सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता, डिजिटल लर्निंग को बढ़ावा और अध्यापकों की व्यापक प्रशिक्षण व्यवस्था ने सीखने के स्तर को ऊपर उठाया है। यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बना है, परंतु आगे कौशल शिक्षा और रोजगारपरक पाठ्यक्रमों की आवश्यकता और अधिक महसूस की जा रही है।

स्वास्थ्य सेवाओं में निरंतर सुधार भी प्रदेश की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। शिशु मृत्यु दर का 21 तक गिर जाना, औसत आयु का 72 वर्ष तक पहुंचना और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार, यह संकेत हैं कि स्वास्थ्य ढांचा मजबूत हुआ है। फिर भी, पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं का असमान वितरण एक चुनौती बनी हुई है।गरीबी दर का सात प्रतिशत से नीचे आना सामाजिक-आर्थिक प्रगति का एक संतोषजनक संकेत है। लेकिन इस उपलब्धि के बावजूद आय असमानता और रोजगार के सीमित अवसरों के कारण ग्रामीण-शहरी अंतर अभी भी स्पष्ट दिखाई देता है। आने वाले वर्षों में आजीविका आधारित विकास मॉडलों को और मजबूती देना जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन आज हिमाचल की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। बादल फटना, भूस्खलन, अनियमित वर्षा और बाढ़ जैसी घटनाओं ने राज्य के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन को गहरे तक प्रभावित किया है। हर आपदा न केवल बुनियादी ढांचे को तोड़ती है, बल्कि पुनर्निर्माण पर भारी खर्च का बोझ भी बढ़ाती है।जनसांख्यिकीय बदलाव भी राज्य के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं। प्रजनन दर में गिरावट और औसत आयु में वृद्धि ने वृद्ध आबादी का प्रतिशत बढ़ा दिया है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन ढांचे और सामाजिक देखभाल प्रणाली पर दबाव बढ़ रहा है। युवाओं का पलायन इस चुनौती को और जटिल बना देता है।

लविद्युत परियोजनाओं के बढ़ते विस्तार ने हालांकि राजस्व के अवसर खोले, लेकिन इनके पर्यावरणीय प्रभावों ने पारिस्थिकी तंत्र को असंतुलित किया है। नदी तंत्र, जैव विविधता और पहाड़ी स्थिरता पर पड़ रहे प्रभावों ने भविष्य में और बड़ी आपदाओं के संकेत भी दिए हैं। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन यहां अत्यंत आवश्यक है।राजस्व में गिरावट और ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा राज्य के दीर्घकालिक विकास के लिए बड़ी चुनौती है। बिजली बिक्री से घटती आय, प्राकृतिक आपदाओं से बढ़ता वित्तीय बोझ और कृषि क्षेत्र की कमज़ोर पकड़ ने आर्थिक स्थिरता की परीक्षा ले ली है। अब आवश्यकता है कि नीति-निर्माता समावेशी विकास, पर्यावरणीय सुरक्षा और आर्थिक विविधीकरण को नई रणनीति के साथ आगे बढ़ाएँ।

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