वित्तीय अनुशासन लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है। कर्ज़ लेना समाधान नहीं, उत्पादन और निवेश बढ़ाना ही स्थायी उपाय है।आर्थिक पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारी सम्मान — यही तीन स्तंभ हैं जिन पर एक सशक्त हिमाचल खड़ा हो सकता है
हिमाचल प्रदेश आज उस खडिया चट्टान,(चूने का पहाड जो भीतर से खोखला होता है) की तरह दिखाई दे रहा है, जिस पर वर्षों से शासन की परतें चढ़ाई गईं, पर भीतर का पत्थर खोखला होता चला गया। हर नई सरकार जब सत्ता में आती है, तो सबसे पहले जनता के सामने “खाली खजाने” की दुहाई देती है। यह रिवायत अब राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुकी है — पिछली सरकार को दोष देना और खुद को आर्थिक मर्यादा के नाम पर मासूम साबित करना। मगर सवाल यह है कि आखिर हिमाचल की अर्थव्यवस्था कब तक इस ‘खाली खजाने’ की कहानी पर टिकी रहेगी? यह संपादकीय इसी खडिया यथार्थ की गहराई में उतरकर देखता है कि क्यों प्रदेश आर्थिक संकट, बेरोजगारी और कर्मचारी असंतोष के दलदल में फंसा है ।
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था बीते एक दशक से लगातार कर्ज़ के बोझ तले दबती जा रही है। राज्य की कुल आय का बड़ा हिस्सा अब कर्ज़ की किश्तें चुकाने और वेतन-पेंशन देने में खर्च हो जाता है। विकास कार्यों के लिए बचता बहुत ही सीमित धन। हर वर्ष बजट में “राजकोषीय अनुशासन” की बात होती है, लेकिन हकीकत यह है कि विकास की जगह सरकारें कर्ज़ लेकर प्रशासनिक खर्च चला रही हैं। केंद्र पर निर्भरता बढ़ी है, और राज्य के अपने संसाधनों के दोहन का कोई दीर्घकालिक खाका नहीं बनाया गसरकारें नए टैक्स लगाने या संसाधन जुटाने के बजाय लोकलुभावन घोषणाओं में अधिक विश्वास रखती हैं। मुफ्त योजनाओं और कर्मचारियों के दबाव में दी गई वित्तीय राहतें राजकोष को और कमजोर कर रही हैं। इस आर्थिक अव्यवस्था का सीधा असर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन पर पड़ रहा है।
हर साल हजारों युवा डिग्रियाँ लेकर रोजगार के इंतजार में दर-दर भटकते हैं। न तो निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की ठोस नीति है, न ही स्वरोजगार योजनाओं में पारदर्शिता।भर्ती परीक्षाओं में लगातार घोटालों और लीक की घटनाओं ने युवाओं का भरोसा तोड़ा है। “
राज्य के कर्मचारी वर्ग का गुस्सा केवल वेतन आयोग या पेंशन की मांग तक सीमित नहीं है; यह उस असमानता और उपेक्षा के प्रति है जो दशकों से चली आ रही है। नियमितीकरण, वेतनमान, एनपीएस से ओपीएस की मांग और समय पर प्रमोशन जैसे मुद्दे अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक असंतोष का रूप ले चुके हैं।हिमाचल में सरकारी कर्मचारी राज्य मशीनरी की रीढ़ हैं। लेकिन उनकी समस्याओं को टालने की राजनीति ने आज स्थिति इतनी गंभीर बना दी है कि हर कुछ महीनों में कर्मचारी संगठन सड़कों पर उतर आते हैं। सरकारें बैठकों और घोषणाओं तक सीमित रह जाती हैं। यह असंतोष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक विश्वास के टूटने का प्रतीक है।
बेरोजगारी: आंकड़ों का खेल और युवाओं की निराशा:प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है। सरकारी आंकड़े सुधार का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहती है। हर साल हजारों युवा डिग्रियाँ लेकर रोजगार के इंतजार में दर-दर भटकते हैं। न तो निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की ठोस नीति है, न ही स्वरोजगार योजनाओं में पारदर्शिता।भर्ती परीक्षाओं में लगातार घोटालों और लीक की घटनाओं ने युवाओं का भरोसा तोड़ा है। “रोजगार मेले” और “स्किल मिशन” जैसे शब्द अब खोखले लगने लगे हैं। युवाओं के पास विकल्प है या तो पलायन करें या फिर ठेके पर काम कर पेट पालें। जब युवा शक्ति निराश होती है, तो वह समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए खतरे का संकेत देती है।
हिमाचल की राजनीति में एक साझा प्रवृत्ति बन चुकी है सत्ता में आते ही पिछली सरकार को दोष देना। हर नई सरकार “खाली खजाना” और “कर्ज़ का बोझ” बताकर जनता से सहानुभूति मांगती है, पर अपने कार्यकाल के अंत तक वही कहानी दोहराती है।सत्ता परिवर्तन से न तो आर्थिक सुधार आया और न ही नीति में निरंतरता। राज्य की नीतियों में दूरदर्शिता की कमी है। हर सरकार अपने कार्यकाल को चुनावी दृष्टि से देखती है, न कि प्रदेश के भविष्य के निवेश के रूप में। नतीजा यह है कि जनता को केवल घोषणाएँ मिलती हैं, नीतियाँ नहीं; आश्वासन मिलते हैं, परिणाम नहीं।
समाधान के सूत्र: आर्थिक अनुशासन से प्रशासनिक ईमानदारी तक:अब समय आ गया है कि हिमाचल की राजनीति और प्रशासन दोनों आत्ममंथन करें। सबसे पहले राज्य को अपनी आय के नए स्रोत तलाशने होंगे। पर्यटन, जलविद्युत, कृषि प्रसंस्करण, और आईटी जैसे क्षेत्रों में नीति-आधारित निवेश जरूरी है।दूसरे, कर्मचारी वर्ग के साथ संवेदनशील संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी। उन्हें केवल खर्च नहीं, बल्कि “राज्य संपत्ति” के रूप में देखा जाए। तीसरे, बेरोजगारी को रोकने के लिए शिक्षा प्रणाली को बाजार से जोड़ना होगा। तकनीकी शिक्षा, स्टार्टअप प्रोत्साहन और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देना अनिवार्य है।साथ ही, वित्तीय अनुशासन लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है। कर्ज़ लेना समाधान नहीं, उत्पादन और निवेश बढ़ाना ही स्थायी उपाय है।
हिमाचल की राजनीति में एक साझा प्रवृत्ति बन चुकी है सत्ता में आते ही पिछली सरकार को दोष देना। हर नई सरकार “खाली खजाना” और “कर्ज़ का बोझ” बताकर जनता से सहानुभूति मांगती है, पर अपने कार्यकाल के अंत तक वही कहानी दोहराती है।
नई राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता:हिमाचल का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब सत्ता सुख से आगे बढ़कर सरकारें “राज्य सुख” की सोच अपनाएँगी। आर्थिक पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारी सम्मान — यही तीन स्तंभ हैं जिन पर एक सशक्त हिमाचल खड़ा हो सकता है।हर बार चुनाव के बाद “खाली खजाने” का राग अलापना अब जनता को छलने जैसा है। हिमाचल को उस नई राजनीति की जरूरत है जो नारे नहीं, नीतियों से प्रदेश की दिशा बदले। यदि यह चिंतन और आत्मावलोकन अब भी नहीं हुआ, तो यह पर्वतीय प्रदेश केवल घोषणाओं और घाटों के बीच झूलता रहेगा — एक “खडिया हिमाचल”जो दिखने में मजबूत पर भीतर से खोखला रहेगा।

