Reading: {1} संपादकीय मंथन, विश्लेषण और चिंतन: हिमाचल में उद्योग और युवाओं का रोजगार: वादे और हकीकत का अंतर।

{1} संपादकीय मंथन, विश्लेषण और चिंतन: हिमाचल में उद्योग और युवाओं का रोजगार: वादे और हकीकत का अंतर।

RamParkash Vats
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Note:—इस संपादकीय लेख मंथन, विश्लेषण और चिंतन: के दो भाग एक साथ है

हिमाचल प्रदेश, जिसे पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है, आज औद्योगिक निवेश का भी केंद्र बन चुका है। बीते दो दशकों में राज्य ने फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, पैकेजिंग और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में बड़ी कंपनियों को आकर्षित किया। सरकार की शर्त साफ़ रही कि प्रदेश में लगने वाले उद्योगों को स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार देना होगा। काग़ज़ों पर यह नियम जितना आकर्षक दिखता है, ज़मीनी स्तर पर इसकी सच्चाई उतनी ही निराशाजनक है।

आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 2005 से 2025 तक लगभग 3,500 से अधिक उद्योग इकाइयाँ स्थापित की गईं, जिनमें लाखों की संख्या में रोज़गार सृजन का दावा किया गया। परंतु श्रम एवं रोजगार विभाग की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से केवल 35–40 प्रतिशत नौकरियाँ ही हिमाचली युवाओं को मिलीं। बाक़ी नौकरियाँ या तो बाहरी राज्यों से आए मज़दूरों को मिलीं या फिर अनुबंधित कर्मियों के हवाले कर दी गईं।

युवाओं का अनुभव और भी कड़वा है। उद्योग प्रारंभिक दौर में प्रदेश के बेरोज़गार युवाओं को नियुक्त कर लेते हैं, लेकिन छह महीने या एक वर्ष की प्रोबेशन अवधि के बाद अधिकांश को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कंपनियाँ नए नियमों का हवाला देकर या लागत घटाने की आड़ में बाहरी श्रमिकों को रख लेती हैं। नतीजा यह कि न तो स्थानीय युवा स्थायी रोज़गार पाते हैं और न ही उनका अनुभव उन्हें कहीं और स्थायी आधार देता है।

यह स्थिति राज्य के रोजगार परिदृश्य को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना रही है। हिमाचल में शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या लगातार बढ़ रही है — हालिया आंकड़ों के अनुसार यह संख्या लगभग 8 लाख के आसपास पहुँच चुकी है। उद्योगों से मिलने वाले रोजगार यदि वास्तविक रूप से स्थानीय युवाओं तक नहीं पहुँचे, तो यह संख्या और बढ़ेगी।

सरकार ने समय-समय पर उद्योगों से स्थानीय युवाओं के हित में समझौते किए, परंतु उनकी निगरानी तंत्र कमज़ोर रहा। कई उद्योग केवल खानापूर्ति करते हैं — नाममात्र का प्रतिशत स्थानीय युवाओं को रखकर नियम पूरा करने का दिखावा। इससे प्रदेश के युवा न घर के रहते हैं, न बाहर रोज़गार पाने की राह आसान होती है।

समाधान साफ़ है। सरकार को चाहिए कि वह कड़े ऑडिट और पारदर्शी रोजगार डेटा जारी करे। उद्योगों को नियमित रूप से यह रिपोर्ट करनी होगी कि उन्होंने कितने हिमाचली युवाओं को स्थायी नौकरी दी है। साथ ही, युवाओं को आधुनिक स्किल डेवलपमेंट और तकनीकी प्रशिक्षण से जोड़ना होगा, ताकि उद्योगों को बाहरी राज्यों पर निर्भर रहने की आवश्यकता न पड़े।

यदि यह सुधार नहीं किए गए, तो हिमाचल का औद्योगिक विकास केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित रह जाएगा। और बेरोज़गारी का बोझ, जो आज राज्य की सबसे बड़ी सामाजिक-आर्थिक समस्या है, और भी गहराता चला जाएगा

उद्योगों की स्थिति

कुछ उद्योगों में कर्मचारियों को पूरा काम नहीं मिल रहा है, या प्रोजेक्ट शुरू होकर बीच में या कुछ महीनों के पश्चात रुक जाते हैं — ऐसा विशेष रूप से देखा गया है जब बाजार की स्थिति खराब हो, विद्युत व्यवस्था में अनिश्चितता हो, या अधोसंरचना और रसद-समस्याएँ हों। सार्वजनिक रिपोर्टों में सीधे “छह माह बाद ब्रेक” जैसा कोई सामूहिक सरकारी डेटा नहीं मिला है, लेकिन पटरी से उतरने, शटडाउन या उत्पादन बंदी की घटनाएँ रिपोर्ट हुई हैं।उदाहरण के तौर पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 115 उद्योग इकाइयाँ राज्य में बंद हो गई हैं, जिनसे लगभग 3,350 लोगों की रोजगार छिन गई है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, राज्य सरकार ने Central Employment Cell स्थापित किया है, जिसका उद्देश्य है तकनीकी और कुशल मानव संसाधन तैयार करना, और उन युवाओं को उद्योगों के अनुसार रोजगार दिलवाना जो उनकी योग्यता के अनुरूप हो।रोजगार एक्सचेंजों में नामांकन करने वाले युवाओं की संख्या में वृद्धि हुई है।

  1. जिला-वार उद्योग इकाइयों की संख्या और उनमें लगे लोगों के आंकड़े।
  2. कितने स्थानीय (हिमाचली) युवा और कितने बाहर से आए लोग काम कर रहे हैं।
  3. कितने उद्योग बंद हुए या “ब्रेक” पर गए, और इससे कितने रोजगार प्रभावित हुए।
  4. सरकारी आदेशों के बावजूद कितनी कंपनियाँ स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं दे रही हैं।
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