Reading: संपादकीय दृष्टिकोण,मंथन और चिंतन: शिक्षा की मूल धारा की ओर लौटने का संकल्प — मोबाइल प्रतिबंध पर व्यापक विश्लेषण

संपादकीय दृष्टिकोण,मंथन और चिंतन: शिक्षा की मूल धारा की ओर लौटने का संकल्प — मोबाइल प्रतिबंध पर व्यापक विश्लेषण

RamParkash Vats
11 Min Read

हिमाचल प्रदेश शिक्षा निदेशालय द्वारा स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर हालिया प्रतिबंध न केवल समयोचित है, बल्कि एक दार्शनिक प्रश्न भी उठाता है: विद्यालय क्या केवल सूचना-संचार का स्थान है या चरित्र, अनुशासन और गहन अध्ययन का ऐसा मंच जहाँ तकनीक नियंत्रित और विवेकपूर्ण रूप से ही प्रवेश कर सकती है? सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि आज की पीढ़ी मोबाइल स्क्रीन की चमक में पाठ्यपुस्तकों और कक्षा-वार्तालाप से दूर होती जा रही है — और इसका असर सीधे बच्चों के शैक्षिक प्रदर्शन और मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य पर दिख रहा है। हिमाचल का निर्देश स्पष्ट करता है कि छात्र मोबाइल नहीं लाएँगे और अध्यापकों को भी कक्षा में मोबाइल छोड़कर आना अनिवार्य होगा; आपातकालीन संपर्क के लिए स्कूलों को वैकल्पिक व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए हैं।


भारतीय गुरुकुल-परंपरा से लेकर औपनिवेशिक पाठशालाओं और आधुनिक सरकारी-निजी विद्यालयों तक, शिक्षा का एक बड़ा उद्देश्य रचना-बद्ध ज्ञान के साथ चरित्र निर्माण और ध्यान-केन्द्रित अध्ययन रहा है। विद्यालयों ने सदैव सामाजिक-नैतिक नियमों और अध्ययन-अनुशासन को प्राथमिकता दी है क्योंकि सीखना केवल तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि एकाग्रचित्त अभ्यास है। डिजिटल युग में यह परंपरा चुनौती के अधीन है: मोबाइल ने ज्ञान के स्रोत को खोला तो परन्तु ध्यान विकर्षण, जल्दी संतुष्टि और सतत बहसजन्य तुलना (social comparison) जैसे नए रोग भी लाए। इसलिए आज जिस तरह से तकनीक को नियंत्रित करने की बात हो रही है, वह असल में शिक्षा के मूल लक्ष्य — एकाग्रता, गहन अध्ययन और सम्यक विकास — की रक्षा का प्रयास है।


मोबाइल और स्क्रीन-समय का बच्चों व किशोरों पर प्रभाव व्यापक रूप से अध्ययन किया जा रहा है। स्क्रीन का अत्यधिक प्रयोग ध्यान-केंद्रित क्षमताओं को कम कर सकता है, नींद में बाधा उत्पन्न कर सकता है और कुछ अध्ययनों ने अवसाद तथा चिंता के लक्षणों के साथ सहसंबंध दर्शाया है। न केवल पर्यवेक्षणीय अध्ययनों, बल्कि हालिया कुछ क्लिनिकल परीक्षणों (जहाँ परिवार-आधारित स्क्रीन ब्रेक लागू किया गया) ने संकेत दिया है कि स्क्रीन समय घटाने से नींद, तनाव और समग्र मानसिक स्वास्थ्य में सुधार आ सकता है — यानि नियंत्रित हस्तक्षेप के लाभ वैज्ञानिक रूप से भी देखने को मिलते हैं।

यहाँ सावधानी की आवश्यकता है: सभी अध्ययनों ने एक-समान परिणाम नहीं दिखाए हैं और कारण-प्रभाव का प्रश्न जटिल है — स्मार्टफोन उपयोग ही समस्या का कारण हो सकता है या पहले से मौजूद चिंता/अवसाद बच्चों को स्क्रीन की ओर धकेलते हों। इसलिए नीति-निर्माता और स्कूल दोनों को वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर नीतियाँ बनानी चाहिए तथा अध्ययनों की सीमाओं को देखते हुए लचीलेता रखनी चाहिए।


दुनिया के कई देशों और शहरों ने स्कूलों में मोबाइल पर नियंत्रण की दिशा में नीतियाँ अपनाई हैं। फ्रांस ने 2018 से मोबाइल पर प्रतिबंध लागू किया और हाल के वर्षों में इसे और सख्त करने की पहलकदमी जारी रखी है — मध्य विद्यालयों में छात्रों से फोन को डिवाइस-लॉकर में रखने की बात की जा रही है ताकि स्कूल दिवस के दौरान उन्हें फोन से पूर्णतः अलग रखा जा सके।

चीन ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं — कई क्षेत्रों में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में छात्रों के फोन लाने पर प्रतिबंध या कड़ाई से नियंत्रण लागू किया गया है, तथा केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इनके उपयोग को नियंत्रित करने के निर्देश दिए हैं। कुछ शहरों (जैसे ज़ेङ्झोउ) ने विशेष निर्णय भी लिए हैं।

जापान के कुछ नगरों और शिक्षा निकायों में भी युवा डिवाइस उपयोग को सीमित करने के प्रस्ताव आए हैं — स्थानीय उदाहरणों से पता चलता है कि सिर्फ कानून नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति और माता-पिता की भागीदारी बहुत मायने रखती है।

भारत में भी विभिन्न राज्य-स्तर की दूरदर्शिता और प्रयोगशील नीतियाँ देखने को मिल रही हैं: कुछ राज्यों और संस्थान-स्तर पर मोबाइल नियंत्रित रखने के अनुभव मौजूद हैं; साथ ही समग्र डिजिटल शिक्षा-उद्यम (smart classes, tablets) से स्पष्ट है कि तकनीक को शिक्षा के हित में उपयोग करने का विकल्प मौजूद है — बुनियादी बात यह है कि तकनीक का उपयोग नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए।

हिमाचल ने जिस तरह से न केवल छात्रों बल्कि अध्यापकों पर भी प्रतिबंध लगाया है और निरीक्षण/अनुशासन के निर्देश दिए हैं, वह व्यवहारिक रूप से प्रभावी बनने का इरादा दर्शाता है। साथ ही विद्यालयों को आपात स्थिति के लिए वैकल्पिक संचार सुविधा सुनिश्चित करने को कहा गया है — जो कि सुदृढ़ नीतिगत सोच का संकेत है। हालाँकि, ऐसे निर्देशों के सफल क्रियान्वयन के लिए प्रशिक्षित निगरानी, स्पष्ट अनुशासनात्मक प्रक्रियाएँ, अभिभावक-समर्थन और स्कूल स्तर पर भौतिक व्यवस्थाएँ (जैसे लॉकर्स या सुरक्षित डिपॉजिट) अनिवार्य हैं।

शोध से निकलने वाले दो बड़े बिंदु हैं — (1) स्क्रीन-समय और मानसिक/शारीरिक स्वास्थ्य के बीच सहसंबंध विद्यमान है, और (2) कुछ नियंत्रित हस्तक्षेप (जैसे स्क्रीन-ब्रेक) से लक्षणों में सुधार आ सकता है। WHO जैसी संस्थाएँ छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन-समय और बैठकर रहने के मानकों पर मार्गदर्शन देती रही हैं, जो नीति निर्धारकों के लिए उपयोगी ढाँचा देती है।

शैक्षिक विशेषज्ञ आमतौर पर कहते हैं कि तकनीक का पूर्ण निषेध समस्या का हल नहीं है — बल्कि शिक्षकों को डिजिटल साक्षरता और तकनीक-समायोजन में प्रशिक्षित करके इसे पाठ्यक्रम के पूरक के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही, अध्यापक-आचरण का मॉडलिंग (teachers as role models) अत्यंत महत्वपूर्ण है — यदि अध्यापक खुद मोबाइल-निरपेक्ष व्यवहार प्रदर्शित करें तो विद्यार्थियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

नीति की सफलता तकनीकी बिंदुओं और मानवीय-समर्थन पर निर्भर करेगी। कुछ व्यावहारिक कदम सुझाव के रूप में:

अभिभावकों और समाज की भूमिका

घर पर भी यदि अभिभावक मोबाइल-अनुशासन का पालन नहीं करेंगे, तो स्कूल एकमात्र स्थान नहीं रह जाएगा जहाँ बच्चों का मोबाइल-व्यवहार नियंत्रित किया जा सके। इसलिए परिवारों को डिजिटल-हाइजीन, स्क्रीन-समय नियम और रात में डिवाइस-कंट्रोल (डिवाइस समय सीमा/कर्फ्यू) अपनाने की प्रेरणा देनी चाहिए। स्थानीय समुदाय, पंचायत और नागरिक समाज को भी जागरूकता-अभियान चलाने चाहिए ताकि नीति धरातल पर प्रभावी बने।

यह महत्वपूर्ण है कि विद्यालय तकनीक विरोधी न बनें। डिजिटल शिक्षण (smart classes, tablets) का सुयोग्य और संरचित उपयोग पाठ्य-लाभ बढ़ा सकता है। प्रतिबंध का तात्पर्य केवल ‘बंद’ करना नहीं, बल्कि कक्षा के भीतर तकनीक के अनियंत्रित उपयोग को रोककर उसे शिक्षण-उपकरण की तरह सीमित करना है। उदाहरणतः परीक्षणों, ऑडियो-विजुअल संदर्भों या दूरस्थ शिक्षा के लिए नियंत्रित समय स्लॉट रखे जा सकते हैं — पर ये नियोजित और सुपरवाइज्ड होने चाहिए।

नीति की सफलता को मापने के लिए कुछ संकेतक रखे जाने चाहिए: कक्षा-ध्यान (observational studies), परीक्षा-प्रदर्शन, स्कूल की उपस्थिति दर, अनुशासनात्मक घटनाओं की संख्या, तथा मानसिक स्वास्थ्य-सर्वे (नमूना-आधारित)। यदि 6-12 महीनों में सकारात्मक संकेत नहीं आते, तो नीति में संशोधन आवश्यक होगा। पायलट, डेटा संग्रह और पारदर्शी रिपोर्टिंग सफलता की कुंजी हैं।

हिमाचल का कदम स्वागत योग्य है — यह शिक्षा के उद्देश्य (एकाग्रता, अनुशासन, समग्र विकास) की रक्षा का प्रयत्न है। परन्तु इसे सफल बनाने के लिए केवल प्रतिबंध ही पर्याप्त नहीं; प्रशिक्षण, पारदर्शिता, अभिभावक-समर्थन, वैकल्पिक संचार व्यवस्था और पायलट-आधारित मापन अनिवार्य हैं। अंतरराष्ट्रीय उदाहरण बताते हैं कि सख्ती के साथ-साथ सामाजिक स्वीकार्यता और निगरानी भी जरूरी है — केवल ‘बैन’ करने से मुद्दा समाप्त नहीं होता। फ्रांस, चीन और अन्य उदाहरणों से सीखकर हम स्थानीय संस्कृति और संसाधनों के अनुसार एक व्यावहारिक, मापने योग्य और संवेदनशील नीति बना सकते हैं।


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